राष्ट्रीय राजनीति
3 दिन पहले
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विचारों
एक दौर था जब भारत अपने हथियारों के लिए दुनिया के बड़े देशों की ओर देखता था। लेकिन आज वही भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की उस मंजिल पर खड़ा है, जिसकी कभी कल्पना भी मुश्किल थी। रक्षा मंत्रालय और आधिकारिक फैक्ट शीट से सामने आए ताजा आंकड़ों ने दुनियाभर के रणनीतिकारों का ध्यान खींचा है।
इस साल भारत ने अपनी तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण और नए हथियारों की खरीद (Capital Acquisition) के लिए ₹1.85 लाख करोड़ का भारी-भरकम बजट तय किया है। दूसरी ओर, देश का घरेलू स्वदेशी रक्षा उत्पादन (Domestic Defense Production) भी ₹1.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह कोई मामूली वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की सैन्य संप्रभुता का प्रतीक है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि देश को अपनी सीमाओं की रक्षा और सैन्य आधुनिकीकरण के लिए जितने मूल्य के हथियार चाहिए, लगभग उतने ही मूल्य का साजो-सामान अब मेक इन इंडिया के तहत भारत के अपने कारखानों में बन रहा है। बड़ी ताकतों की हथियारों के दम पर चलने वाली दादागिरी का दौर अब बीते समय की बात बनता जा रहा है, क्योंकि भारत न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर रहा है, बल्कि दुनिया के 80 से अधिक देशों को हथियार भी बेच रहा है।
ऐतिहासिक रक्षा बदलाव की पांच अहम बातें
- आत्मनिर्भरता का सटीक संतुलन: सेना की नई हथियार खरीद का बजट ₹1.85 लाख करोड़ है, जबकि देश का स्वदेशी रक्षा उत्पादन ₹1.78 लाख करोड़ के करीब पहुंच चुका है, जो रक्षा इतिहास में एक अभूतपूर्व संतुलन है।
- उत्पादन में 283% की बड़ी छलांग: वर्ष 2014-15 में भारत का स्वदेशी रक्षा उत्पादन सिर्फ ₹46,429 करोड़ था, जो बीते एक दशक के नीतिगत सुधारों के चलते करीब पौने तीन गुना बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर आ गया है।
- घरेलू उद्योगों के लिए ₹1.39 लाख करोड़ आरक्षित: सरकार ने हथियार खरीद के कुल बजट का 75% हिस्सा (₹1.39 लाख करोड़) केवल भारतीय कंपनियों, एमएसएमई और निजी उद्योगों से खरीद के लिए सुरक्षित कर दिया है।
- रक्षा निर्यात में 56 गुना उछाल: घरेलू उत्पादन मजबूत होने का असर निर्यात पर भी दिखा है। वर्ष 2013-14 में जो रक्षा निर्यात महज ₹686 करोड़ था, वह अब बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो चुका है।
- डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में निजी क्षेत्र की एंट्री: रक्षा अनुसंधान (R&D) का बजट 112% बढ़ाकर ₹29,100.25 करोड़ किया गया है। साथ ही डीआरडीओ ने अपनी 24 प्रयोगशालाओं के दरवाजे निजी क्षेत्र के परीक्षणों के लिए खोल दिए हैं।
नेट बायर से नेट प्रोड्यूसर बनता भारत
इन आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें तो साफ होता है कि भारत की पुरानी और मौजूदा रक्षा नीति में एक वैचारिक क्रांति आई है। पहले भारत अपनी रक्षा जरूरतों का बड़ा हिस्सा सीधे विदेशी कंपनियों से आयात करता था, जिससे देश का खजाना भी खाली होता था और युद्ध के समय विदेशी प्रतिबंधों का खतरा भी बना रहता था।
अब ₹1.85 लाख करोड़ की खरीद के मुकाबले ₹1.78 लाख करोड़ का घरेलू उत्पादन यह साबित करता है कि हल्के लड़ाकू विमान (तेजस), ब्रह्मोस मिसाइलें, पिनाका तोपें, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर और आधुनिक रडार अब हम अपनी ही धरती पर तैयार कर रहे हैं।
सबसे बड़ा गेम-चेंजर कदम
इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा गेम-चेंजर कदम हथियार खरीद बजट का 75% हिस्सा घरेलू कंपनियों के लिए आरक्षित करना है। इससे टाटा, कल्याणी और एलएंडटी जैसे भारतीय निजी क्षेत्र को सुनिश्चित ऑर्डर मिल रहे हैं, जिससे उनकी इकोनॉमी ऑफ स्केल बेहतर हो रही है। यही वजह है कि भारत का रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ के नए शिखर तक पहुंच गया है, जो 2047 के 'विकसित भारत' के विजन की मजबूत नींव रख रहा है।
सवाल-जवाब
हथियार खरीद के बजट और घरेलू रक्षा उत्पादन के आंकड़ों में क्या खास समानता दिख रही है?
ताजा बजटीय आंकड़ों के अनुसार, सरकार ने सेनाओं के लिए नए हथियारों की खरीद (Capital Acquisition) पर ₹1.85 लाख करोड़ खर्च करने का प्रावधान किया है, जबकि देश का घरेलू स्वदेशी रक्षा उत्पादन भी बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यानी भारत अब अपनी जरूरत के लगभग बराबर मूल्य का रक्षा सामान खुद घर में बना रहा है।
रक्षा आधुनिकीकरण बजट का 75% हिस्सा भारतीय उद्योगों के लिए आरक्षित करने से क्या फायदा होगा?
हथियार खरीद के बजट से ₹1.39 लाख करोड़ केवल घरेलू और निजी भारतीय उद्योगों के लिए सुरक्षित कर देने से विदेशी आयात पर निर्भरता खत्म होगी। इससे घरेलू एमएसएमई और निजी प्लेयर्स को बड़े निवेश का भरोसा मिलेगा, देश में रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे और रक्षा क्षेत्र में सहायक उद्योगों का एक मजबूत जाल तैयार होगा।
स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास और परीक्षण के लिए डीआरडीओ स्तर पर क्या बड़े सुधार हुए हैं?
रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन को 112 प्रतिशत बढ़ाकर ₹29,100.25 करोड़ किया गया है, जिसका 25% हिस्सा स्टार्टअप्स के लिए खुला है। इसके साथ ही पारदर्शिता लाने के मकसद से डीआरडीओ ने अपनी 24 प्रयोगशालाओं की विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं को 'रक्षा परीक्षण पोर्टल' के जरिए सीधे निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध करा दिया है।
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