अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सुरक्षा का बड़ा खेल: क्लिंटन के बाद अब ट्रंप के साथ अपनाया गया वही पुराना सीक्रेट फॉर्मूला विश्व एक घंटा पहले 3
अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सुरक्षा के लिए एजेंसियां किस हद तक जा सकती हैं, इसका प्रमाण 25 साल पहले बिल क्लिंटन और हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुए गुप्त ऑपरेशंस से मिलता है।

सुरक्षा का अभेद्य चक्र और सीक्रेट सर्विस

अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सुरक्षा के लिए सीक्रेट सर्विस और सेना किस हद तक जा सकती है, इसका अंदाजा दो अलग-अलग दशकों की बेहद रोमांचक घटनाओं से लगाया जा सकता है। जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की जान पर गंभीर खतरा होता है, तो सुरक्षा एजेंसियां किस तरह से मीडिया और दुनिया की आंखों में धूल झोंककर सीक्रेट ऑपरेशन को अंजाम देती हैं। यह कहानी 25 साल पुरानी घटना और वर्तमान के एक बड़े सुरक्षा इंतजाम के इर्द-गिर्द घूमती है।

पाकिस्तान में उतरा था नकली एयरफोर्स वन

मार्च 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंचे थे। उस समय अमेरिका को राष्ट्रपति की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा महसूस हो रहा था। इस दौरे को सुरक्षित बनाने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने एक बेहद चालाकी भरी योजना तैयार की। मीडिया की मौजूदगी के सामने पहले एक विमान उतारा गया, जिस पर पूरी तरह से एयरफोर्स वन के निशान बने थे। इसके बाद, क्लिंटन जैसे दिखने वाले एक सीक्रेट सर्विस एजेंट को भी विमान से बाहर निकाला गया। मौके पर मौजूद मीडिया को यही लगा कि राष्ट्रपति इसी विमान से उतरे हैं। लेकिन असलियत कुछ और ही थी। कुछ देर बाद वहां एक बिना पहचान वाला सामान्य विमान उतरा और उसी से असली बिल क्लिंटन बाहर निकले। यानी मीडिया की नजरों के सामने एक डमी विमान और डिकॉय ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया था।

पत्रकार को पहले से पता था पूरा राज

इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी बेहद सीमित लोगों तक ही सीमित थी। क्लिंटन के भारत से पाकिस्तान जाने से पहले, व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने उन्हें एक गोपनीय ऑफ-द-रिकॉर्ड ब्रीफिंग दी थी। इसमें स्पष्ट किया गया था कि सुरक्षा कारणों से राष्ट्रपति सामान्य तरीके से एयरफोर्स वन से पाकिस्तान की धरती पर कदम नहीं रखेंगे। सुसान पेज ने बताया कि उन्हें यह भी जानकारी दी गई थी कि इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति और उनके साथ यात्रा कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए असाधारण इंतजाम किए गए हैं। उस समय ये बातें सार्वजनिक नहीं की गई थीं, क्योंकि ब्रीफिंग ऑफ-द-रिकॉर्ड थी। हालांकि, ढाई दशक बीत जाने के बाद अब इस दिलचस्प वाकये का खुलासा किया गया है।

ट्रंप के साथ भी दोहराया गया वही इतिहास

अब बात करते हैं वर्तमान की। पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा के लिए भी कुछ ऐसा ही गुप्त ऑपरेशन तुर्की में चलाया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की ओर से ट्रंप के खिलाफ एक विश्वसनीय खतरे की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को मिली थी। इसके तुरंत बाद, सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें बिना किसी देरी के एयरफोर्स वन से चुपचाप एक दूसरे छोटे और बिना पहचान वाले विमान में शिफ्ट कर दिया। इस प्रक्रिया को बेहद गुप्त रखा गया था। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप को विमान से दूसरे विमान तक ले जाने के लिए एक कैटरिंग ट्रक का इस्तेमाल किया गया। इस दौरान एयरफोर्स वन के भीतर 100 से ज्यादा अधिकारी, कर्मचारी और पत्रकार ब्रिटेन की ओर अपनी उड़ान जारी रखे हुए थे। इनमें से ज्यादातर लोगों को भनक तक नहीं थी कि ट्रंप उस बड़े विमान में अब सवार ही नहीं हैं।

मीडिया और अधिकारियों को दी गई सख्त हिदायतें

ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखने के लिए एयरफोर्स वन में मौजूद पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को विमान की खिड़कियों के शेड नीचे रखने का कड़ा निर्देश दिया गया था। उस समय नाटो समिट में ट्रंप के साथ गए विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट भी उसी बड़े विमान में मौजूद थे। एक तरफ राष्ट्रपति को पूरी गोपनीयता के साथ दूसरे विमान में स्थानांतरित किया गया, तो दूसरी ओर एयरफोर्स वन को सामान्य रूप से ब्रिटेन की ओर भेजा गया ताकि ट्रंप की असली लोकेशन गुप्त बनी रहे।

डोनाल्ड ट्रंप ने खुद बताई आपबीती

बाद में स्वयं डोनाल्ड ट्रंप ने इस घटना की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि सीक्रेट सर्विस और सेना ने उन्हें सुरक्षा के लिहाज से दूसरे विमान में जाने का स्पष्ट निर्देश दिया था। ट्रंप के अनुसार, उन्हें यह जानकारी दी गई थी कि जिस विमान में वह पहले सवार थे, उस पर खतरा कहीं ज्यादा था। उन्होंने कहा कि वह सुरक्षा एजेंसियों और सेना के फैसलों का पूरी तरह से सम्मान करते हैं और उनके निर्देशों का पालन करते हैं। उन्हें जो भी खतरा बताया गया था, उसके बाद उन्हें दूसरा विमान ज्यादा सुरक्षित लगा और वह उसी में सवार होकर आगे बढ़े।

25 साल बाद भी तरीका एक ही

बिल क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के इन दोनों मामलों में भले ही 25 साल का लंबा अंतराल है, लेकिन इनका मूल उद्देश्य एक ही था, और वह है दुश्मन को राष्ट्रपति की सटीक लोकेशन और विमान की पहचान से पूरी तरह अनजान रखना। क्लिंटन के दौर में डिकॉय एयरफोर्स वन और उनके हमशक्ल एजेंट का उपयोग किया गया था, जबकि ट्रंप के मामले में कैटरिंग ट्रक की आड़ लेकर विमान बदलने का जटिल ऑपरेशन चलाया गया। दोनों ही उदाहरण यह दर्शाते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए एजेंसियां किस हद तक अपनी रणनीति में लचीलापन और गोपनीयता रखती हैं।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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