उत्तर प्रदेश
2 घंटे पहले
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के तहत शांति भंग की आशंका के नाम पर हिरासत में लेने की शक्तियों के कथित दुरुपयोग को लेकर तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने दो टूक कहा कि नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सबसे ऊपर है और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी को भी जेल नहीं भेजा जा सकता। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मंसूर अहमद उर्फ लल्लू की याचिका पर सुनवाई के दौरान पाया कि उन्हें 8 दिन तक अवैध रूप से न्यायिक हिरासत में रखा गया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ित को 6 सप्ताह के भीतर 2 लाख रुपये का मुआवजा अदा किया जाए।
एसीपी के वेतन से होगी मुआवजे की वसूली
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस प्रकरण में एसीपी बारा वेद व्यास मिश्रा और विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170, 126 और 135 का घोर उल्लंघन किया। अदालत के अनुसार, व्यक्ति को शांति बनाए रखने के लिए केवल पर्सनल बॉन्ड भरने का अवसर दिया जाना चाहिए था, मगर इसके उलट उसे सीधे जेल भेज दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि मुआवजे की राशि की जांच कर दोषी पाए जाने की स्थिति में इसकी वसूली एसीपी के वेतन से की जाए। उल्लेखनीय है कि वेद व्यास मिश्रा फिलहाल प्रयागराज में ही तैनात हैं।
पुलिस कमिश्नरेट की स्थिति पर चिंता
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट में हालात चिंताजनक हैं और पुलिस कमिश्नरों को मिली मजिस्ट्रेटी शक्तियों का 'घोर दुरुपयोग' हो रहा है। अदालत ने कहा कि शांति भंग की आशंका के नाम पर लोगों को लंबे समय तक जेल में रखा जा रहा है, जबकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता। कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे इस आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 14 सितंबर 2026 तक पेश करें।
रिकॉर्ड में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड की पड़ताल की, जिसमें ये तथ्य उजागर हुए:
- 2024 में 283 लोग
- 2025 में 1,321 लोग
- 2026 में अब तक 721 लोग
इस तरह कुल मिलाकर 2,325 लोगों को प्रिवेंटिव धाराओं (BNSS 126, 135, 170) के तहत हिरासत में लिया गया। कोर्ट के अनुसार, इनमें से कई लोगों को 1 दिन से लेकर 20 दिन तक हिरासत में रखा गया।
19 मार्च की रात हुई थी गिरफ्तारी
रिकॉर्ड के मुताबिक, 19 मार्च 2026 की रात करीब 12:50 बजे खीरी थाना पुलिस ने मंसूर अहमद को उनके घर से उठाया था। पुलिस ने उन्हें BNSS की धारा 170, 126 और 135 के तहत हिरासत में लेकर एसीपी (विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट) बारा के समक्ष पेश किया। हाईकोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने बिना उचित सुनवाई किए एक छपे-छपाए आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए और आरोपी को सीधे 8 दिन के लिए जेल भेज दिया गया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आदेश में कहीं यह दर्ज नहीं था कि आरोपी ने पर्सनल बॉन्ड देने से इनकार किया हो। मंसूर अहमद को 27 मार्च 2026 को रिहा किया गया।
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