मंदिर में घंटी बजाने का क्या है धार्मिक महत्व और सही नियम, जानें यहाँ धर्म 2 महीने पहले 90
हिंदू धर्म में मंदिरों में घंटी बजाने की परंपरा बहुत पुरानी है, जो केवल एक रस्म नहीं बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हैं।

मंदिर में घंटी का महत्व और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता

सनातन परंपरा में जब भी हम किसी मंदिर में जाते हैं, तो मुख्य प्रवेश द्वार पर लगी घंटी बजाना अनिवार्य माना जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है और इसके पीछे की वजह क्या है? मंदिरों में घंटी बजाने की परंपरा सदियों पुरानी है। कुछ लोग मंदिर में प्रवेश करते ही घंटी बजाते हैं, तो कुछ लोग पूजा के दौरान इसे बार-बार बजाते हैं। दरअसल, मंदिर में घंटी बजाने के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों ही तरह के कारण निहित हैं।

प्रवेश द्वार पर घंटी बजाने का अर्थ

जब हम मंदिर के मुख्य द्वार पर लगी घंटी बजाते हैं, तो इसका सबसे प्रमुख उद्देश्य ईश्वर के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कराना होता है। भक्तों का मानना है कि घंटी की आवाज सुनने के बाद ही देवी-देवता उनकी प्रार्थना पर ध्यान केंद्रित करते हैं। साथ ही, ऐसी मान्यता है कि घंटी से निकलने वाली विशेष ध्वनि प्रतिमा में छिपी दैवीय चेतना को जागृत करती है। यह ध्वनि आसपास की नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने में सक्षम मानी जाती है, जिससे मंदिर का वातावरण पूरी तरह पवित्र और शुद्ध हो जाता है। जब भक्त घंटी बजाकर ईश्वर का आह्वान करते हैं, तो उनका मन सांसारिक चिंताओं से दूर होकर ईश्वर की भक्ति में एकाग्र हो जाता है।

पूजा के दौरान घंटी बजाने के विशेष नियम

मंदिर में घंटी बजाने के भी कुछ शास्त्रोक्त नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन करना हर श्रद्धालु के लिए आवश्यक है:

  • प्रवेश के समय: जब आप मंदिर के परिसर में प्रवेश करें, तो केवल 2 से 3 बार ही घंटी बजानी चाहिए। इसे अत्यधिक जोर से या कर्कश तरीके से नहीं बजाना चाहिए, क्योंकि इससे मधुर ध्वनि के बजाय शोर उत्पन्न होता है।
  • आरती के समय: आरती के दौरान घंटी बजाने का विधान अलग है। इसमें कोई संख्या निश्चित नहीं है। आरती शुरू होने से लेकर उसके अंत तक निरंतर घंटी बजाई जाती है, लेकिन इसका ध्यान रखना चाहिए कि उसकी लय आरती के सुर और ताल के साथ मेल खाती हो। घंटी की आवाज मधुर और कानों को प्रिय लगनी चाहिए।
  • निकास के समय: यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम है कि जब आप मंदिर से बाहर निकलें, तो उस समय घंटी को बिल्कुल न बजाएं। मंदिर में प्रवेश करना उपस्थिति दर्ज कराने का प्रतीक है, लेकिन विदाई के समय घंटी बजाना वर्जित माना गया है।

दोपहर के समय घंटी बजाने से क्यों बचें?

धर्म शास्त्रों के अनुसार, दोपहर के समय मंदिरों में पूजा करना और घंटी बजाना अनुचित माना गया है। ऐसा माना जाता है कि दोपहर में भगवान विश्राम की अवस्था में होते हैं। यही कारण है कि अधिकांश मंदिरों में दोपहर के समय पट बंद कर दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ प्रमुख मंदिरों के गर्भगृह में आम भक्तों को घंटी बजाने की अनुमति नहीं होती है। वहां केवल पुजारियों द्वारा ही निर्धारित समय पर घंटी बजाई जाती है। इन नियमों का पालन करना न केवल अनुशासन को दर्शाता है, बल्कि आपकी पूजा और भक्ति को अधिक फलदाई बनाने में भी सहायक होता है।

मीरा शर्मा पाबना की धर्म एवं संस्कृति लेखिका हैं, जो त्योहार, धर्म, ज्योतिष और परंपराओं पर लिखती हैं। व्रत-त्योहारों के महत्व, पूजा विधि और आस्था से जुड़े विषयों को वे श्रद्धा और जानकारी के साथ पेश करती हैं। वाराणसी से उनका जुड़ाव उनके लेखन में झलकता है।

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