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एक घंटा पहले
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उत्तराखंड में अलग है रक्षाबंधन की तारीख
पूरे भारत में भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न होता है। हालांकि, उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में एक ऐसा समाज निवास करता है, जो सामान्य तिथि से करीब 18 दिन बाद रक्षाबंधन का त्योहार मनाता है। तिवारी समाज की इस विशिष्ट परंपरा के कारण यह पर्व देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग और खास माना जाता है। इस वर्ष भी जहां देशभर में 28 अगस्त को रक्षाबंधन मनाया गया, वहीं इस समाज में राखी का पर्व इससे कई दिन बाद मनाया जा रहा है।
गौतम ऋषि की चूक से जुड़ी कहानी
नैनीताल के रहने वाले डॉक्टर ललित तिवारी इस अनोखी परंपरा के पीछे की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि की जानकारी देते हैं। उनके अनुसार, तिवारी समाज मूल रूप से गौतम ऋषि के अनुयायी हैं और उनका गोत्र भी गौतम है। समाज के लोगों का मानना है कि इस परंपरा की जड़ें गौतम ऋषि के जीवन से जुड़ी एक घटना में निहित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर ऋषियों का एक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें जनेऊ धारण करने की रस्म पूरी की जा रही थी। उस दौरान ऋषि भारद्वाज ने गौतम ऋषि को सभी ऋषियों को जनेऊ धारण कराने का सुझाव दिया।
गौतम ऋषि ने पूरी निष्ठा के साथ सभी ऋषियों को जनेऊ पहना दिया, लेकिन जब स्वयं उनके जनेऊ धारण करने का समय आया, तब तक हस्त नक्षत्र का शुभ मुहूर्त समाप्त हो चुका था। अपने अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिए उन्होंने दोबारा गणना की और तब पता चला कि अगला शुभ मुहूर्त करीब 18 दिन बाद आ रहा है। उसी शुभ तिथि पर गौतम ऋषि ने अपना जनेऊ धारण किया था। इसी धार्मिक घटनाक्रम और परंपरा को आधार मानते हुए तिवारी समाज आज भी श्रावणी पूर्णिमा के 18 दिन बाद आने वाले इस दिन को विशेष महत्व देता है और रक्षाबंधन का त्योहार मनाता है।
हरतालिका तीज और राखी का संबंध
डीएसबी कॉलेज, नैनीताल के वनस्पति विज्ञान विभाग में कार्यरत प्रोफेसर डॉक्टर ललित तिवारी बताते हैं कि कुमाऊं में इस परंपरा का गहरा संबंध हरतालिका के पर्व से भी है। रक्षाबंधन के ठीक 18 दिन बाद हरतालिका तीज का त्योहार आता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए कठोर व्रत रखती हैं। हरतालिका के दिन भगवान शिव और गणेश जी की पूजा करने का विधान है। महिलाएं स्वयं मिट्टी से भगवान शिव और गणेश की प्रतिमाएं बनाती हैं और उनकी विधि-विधान से आराधना करती हैं। इस दिन कई महिलाएं दिनभर बिना अन्न और जल ग्रहण किए निराहार रहकर उपवास का पालन करती हैं।
इन समुदायों में भी जीवित है परंपरा
यह अनोखी परंपरा केवल तिवारी समाज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि तिवारी, त्रिपाठी और त्रिवेदी समुदायों में भी इसका निर्वहन किया जाता है। इन सभी समुदायों को सामवेदी ब्राह्मण परंपरा का हिस्सा माना जाता है। मैदानी इलाकों में जिसे सामान्यतः हरतालिका तीज के नाम से जाना जाता है, कुमाऊं के इन क्षेत्रों में इसे हरतालिका के रूप में मनाने की सदियों पुरानी परंपरा है। इस वर्ष हरतालिका का पर्व 13 सितंबर को मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर धार्मिक अनुष्ठान तो होते ही हैं, साथ ही परिवार और समाज की परंपराओं का भी निर्वहन किया जाता है। तिवारी समाज में इसी दिन रक्षाबंधन मनाने के कारण भाई-बहन के रिश्ते का यह पर्व पूरे क्षेत्र में एक अलग समय पर दिखाई देता है। आधुनिकता के इस दौर में भी तिवारी समाज ने अपनी इस पुरातन संस्कृति को सहेज कर रखा है। बुजुर्गों से मिली इस धार्मिक विरासत को नई पीढ़ी भी उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है। युवा वर्ग न केवल इन अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है, बल्कि उनसे जुड़े रीति-रिवाजों का पालन भी पूरी गंभीरता से कर रहा है।
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