वाराणसी: काशी में इस दिन 'बीमार' होते हैं भगवान जगन्नाथ, 236 वर्ष पुरानी अनोखी परंपरा का पूरा इतिहास जानिए उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 2
वाराणसी के अस्सी क्षेत्र में स्थित भगवान जगन्नाथ के प्राचीन मंदिर में हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा को अधिक स्नान के बाद भगवान 'बीमार' होकर 14 दिन एकांतवास में रहते हैं। यह परंपरा 236 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।

धार्मिक नगरी काशी अपनी अनूठी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में पहचानी जाती है। शहर के दक्षिणी छोर पर देश का दूसरा सबसे प्राचीन भगवान जगन्नाथ मंदिर स्थित है, जहां हर वर्ष एक विशेष तिथि पर श्रद्धालु अपने आराध्य को गंगाजल से स्नान कराते हैं। भक्तों के अपार स्नेह के चलते भगवान भी गर्भगृह छोड़कर मंदिर की छत पर विराजमान हो जाते हैं। मान्यता है कि अत्यधिक स्नान कराए जाने के कारण भगवान जगन्नाथ 'बीमार' पड़ जाते हैं। यह परंपरा बीते 236 वर्षों से लगातार चली आ रही है।

वाराणसी के अस्सी क्षेत्र में स्थित इस प्राचीन मंदिर में हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को यह विलक्षण दृश्य देखने को मिलता है। इस दिन प्रभु जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ छत पर विराजते हैं और सुबह से लेकर शाम तक भक्त उन्हें स्नान कराते रहते हैं। श्रद्धालुओं की भावना रहती है कि उनके आराध्य गर्मी से व्याकुल हैं, इसलिए उन्हें शीतलता प्रदान की जाए। इस वर्ष 29 जून को भगवान की जलयात्रा निकाली जाएगी और उसके अगले ही दिन से भगवान 'बीमार' पड़ जाएंगे।

14 दिन एकांतवास में रहते हैं भगवान

मंदिर ट्रस्ट से जुड़े डॉ. शशि ने बताया कि आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा तिथि से चतुर्दशी तिथि तक भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ 'बीमार' रहते हैं। इस अवधि में वे एकांतवास में रहते हैं। बीमारी की इस स्थिति में भगवान को काढ़े का भोग अर्पित किया जाता है, जबकि अंतिम दिन स्वस्थ होने पर उन्हें परवल का जूस पिलाया जाता है। प्रतिदिन भगवान को चढ़ाया गया यह काढ़ा प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस प्रसाद से उन्हें पूरे वर्ष रोगों से मुक्ति मिलती है।

स्वस्थ होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं भगवान

बीमारी से उबरने के बाद भगवान जगन्नाथ मन बहलाने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं, जिसे रथयात्रा कहा जाता है। इन तीन दिनों के दौरान भगवान अपने भक्तों के बीच रहते हैं और उनकी मनोकामनाएं सुनते हैं। काशी की यह रथयात्रा जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा की तर्ज पर आयोजित होती है। इसी दिन से काशी में त्योहारों की शुरुआत मानी जाती है और इस आयोजन को लक्खा मेला कहकर पुकारा जाता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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