रिश्तेदार के खेत से मिली प्रेरणा, अब सरगुजा के किसान ने देसी मीठे पान की खेती से बदली अपनी किस्मत छत्तीसगढ़ एक दिन पहले 6
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के एक किसान ने अपने शौक को मुनाफे वाली खेती में बदल दिया है। बिना किसी खास कीटनाशक या अतिरिक्त खर्च के, महज छह महीने में उनके द्वारा लगाई गई मीठे पान की फसल अब लहलहा रही है।

खेती में नया प्रयोग

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के रहने वाले अजय दास ने खेती में एक ऐसा नया प्रयोग किया है जो अन्य किसानों के लिए एक नजीर बन गया है। उन्होंने पारंपरिक फसलों से हटकर मीठे देसी पान की खेती में हाथ आजमाया है। शुरुआत में महज एक शौक के तौर पर शुरू की गई यह पहल अब एक सफल व्यावसायिक मॉडल के रूप में सामने आई है। अजय दास के खेत में आज पान की बेलें पूरी तरह तैयार हैं और उन पर हजारों की संख्या में पत्ते लहलहा रहे हैं। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही जानकारी और थोड़ी सी लगन के साथ खेती को बेहद लाभदायक बनाया जा सकता है।

रिश्तेदार के खेत से मिला विचार

इस पूरी कहानी की शुरुआत लखनपुर से हुई थी, जहाँ अजय दास अपने एक रिश्तेदार के घर गए थे। वहां उन्होंने पान की खेती को करीब से देखा और जब उन्होंने वहां के देसी मीठे पान का स्वाद चखा, तो वे काफी प्रभावित हुए। उन्हें यह ख्याल आया कि क्यों न इस फसल को अपने खेत में भी उगाया जाए। उन्होंने अपने रिश्तेदार से पान के पौधे और उनकी कलम ली और अपने गांव लौट आए। इस छोटी सी शुरुआत ने आगे चलकर एक बड़े प्रयोग का रूप ले लिया। बिना किसी सरकारी योजना या कृषि विशेषज्ञ की सलाह के, केवल अपने निजी अनुभव और सूझबूझ से उन्होंने इस खेती को अंजाम दिया है।

पौधों की देखभाल और विकास

अजय दास के अनुसार, पान की खेती के लिए उन्होंने कोई बहुत जटिल तकनीकी प्रक्रिया नहीं अपनाई। उन्होंने बताया कि पौधों को लगाने के लिए जमीन में महज आधा फीट गहरा गड्ढा खोदा गया। इसके बाद पौधों की रोपाई की गई। सबसे खास बात यह रही कि इसके लिए किसी भी महंगे उर्वरक या रासायनिक खाद की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। पिछले छह महीने की अवधि में यह पौधे पूरी तरह से विकसित हो गए हैं और अब इनमें एक से दो हजार के बीच पत्ते आ चुके हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न तो किसी कीट का डर सताया और न ही फसल में किसी तरह की बीमारी देखी गई, जो इसे एक आसान और कम लागत वाली खेती बनाती है।

बाजार और भविष्य की संभावनाएं

फिलहाल अजय दास ने अपने खेतों से पान के पत्तों की तुड़ाई शुरू नहीं की है। उनका मुख्य ध्यान अभी पौधों के पूर्ण विकास पर है। उन्होंने बताया कि अभी वे बाजार में इन मीठे पान के पत्तों की मांग और उनकी सही कीमतों का पता लगाने की प्रक्रिया में हैं। हालांकि, उन्हें पूरा विश्वास है कि उनकी यह मेहनत रंग लाएगी। किसान का यह मानना है कि यदि कोई भी व्यक्ति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर इस खेती को बड़े स्तर पर शुरू करे, तो यह आमदनी का एक बेहतरीन जरिया साबित हो सकता है। कम समय और कम खर्च में तैयार होने वाली यह फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्षमता रखती है। अजय दास का यह प्रयोग साबित करता है कि खेती के पारंपरिक ढांचे को तोड़कर नए रास्ते खोजने की काफी संभावनाएं हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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