दहेज नहीं, बेटियों को दीजिए ये 3 चीजें, फिर ससुराल में कोई उन्हें आंख दिखाने से पहले सौ बार सोचेगा जीवनशैली एक घंटा पहले 3
दहेज आज भी हजारों महिलाओं की जान ले रहा है। माता-पिता अगर बेटियों को दहेज की जगह शिक्षा, आत्मसम्मान और अपना अटूट साथ दें, तो बेटी जीवनभर मजबूत और सुरक्षित रह सकती है।

दहेज आज भी हमारे समाज की सबसे गहरी जड़ें जमाए बैठी समस्याओं में से एक है। हर साल हजारों महिलाएं इसी की मांग और इससे जुड़े उत्पीड़न का शिकार बनती हैं। ऐसे हालात में जरूरी यह है कि माता-पिता अपनी बेटियों को दहेज देने के बजाय कुछ ऐसी चीजें दें, जो उम्र भर उनके काम आती रहें।

कभी दहेज को बेटी की आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन वक्त के साथ यह एक ऐसी सामाजिक बुराई में बदल गया, जिसने लाखों परिवारों की जिंदगी को झकझोर दिया। आज भी देश की कई महिलाएं दहेज की मांग, मानसिक प्रताड़ना और हिंसा से जूझ रही हैं।

आंकड़े जो सिर्फ संख्या नहीं, कहानियां हैं

NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, दहेज से जुड़े उत्पीड़न के चलते एक साल में 5,737 महिलाओं की मौत हुई। यानी औसतन हर दिन 16 महिलाओं ने अपनी जान गंवा दी। ये केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि उन बेटियों की दास्तानें हैं, जो एक बेहतर जिंदगी का सपना संजोकर ससुराल गई थीं।

कैसे एक भावना मांग और सौदेबाजी में बदल गई

इतिहास पर नजर डालें तो दहेज की शुरुआत आज जैसी कतई नहीं थी। पुराने जमाने में माता-पिता अपनी बेटी को शादी के बाद आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने के लिए कुछ संपत्ति, गहने या जरूरत का सामान दिया करते थे। इसे बेटी के अधिकार और सुरक्षा का एक रूप माना जाता था।

लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा मांग और लेन-देन में तब्दील हो गई। जहां कभी बेटी को कुछ देने की भावना थी, वहीं बाद में लड़के वालों की अपेक्षाएं और दबाव बढ़ने लगे। नतीजा यह हुआ कि दहेज कई परिवारों के लिए एक बोझ बन गया।

अपराध है फिर भी क्यों हो रहे कांड

भारत में दहेज लेना और देना, दोनों ही कानूनन अपराध हैं। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज की मांग करना, उसे लेना, देना या इसमें किसी भी तरह की मदद करना दंडनीय है। कानून के मुताबिक दोषी साबित होने पर कम से कम 5 साल की जेल हो सकती है। साथ ही 15,000 रुपए या ली गई दहेज की रकम, इनमें से जो भी अधिक हो, उतना जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

इस कानून का मकसद दहेज प्रथा पर रोक लगाना और महिलाओं को इससे जुड़े उत्पीड़न से बचाना है, फिर भी यह अपराध आज तक खुलेआम होता आ रहा है। सवाल यह है कि अगर यह अपराध हो रहा है, तो चूक किसकी ओर से है, लड़की के माता-पिता की या ससुराल की? सच यह है कि ताली दोनों हाथों से बजती है।

बच्ची की अच्छी जिंदगी के लिए माता-पिता भर-भरकर दहेज तो दे देते हैं, लेकिन कई ससुराल वालों की संतुष्टि इसमें भी नहीं होती, क्योंकि उनकी मांगें और भी बढ़ती चली जाती हैं। इसके बाद नतीजा क्या होता है, लड़की को जीवनभर दहेज के लिए सताया जाता है और कई बार तो उसे मौत के घाट तक उतार दिया जाता है।

ये नाम याद दिलाते हैं कि लिस्ट कितनी लंबी है

ट्विशा शर्मा का मामला पिछले कई महीनों से चर्चा में है। इसके अलावा दीपिका नागर केस, दिल्ली पुलिस की SWAT कमांडो काजल चौधरी, ग्रेटर नोएडा की निक्की भाटी, अलीगढ़ की नीलम भारती का मामला और देश के सबसे चर्चित दहेज मामलों में से एक निशा शर्मा केस इसकी मिसाल हैं। ये तो महज 4-5 नाम हैं, असल फेहरिस्त बहुत लंबी है। सच कहूं तो हर बेटी के माता-पिता को दहेज नहीं, बल्कि ये 3 चीजें जरूर देनी चाहिए।

1. दहेज का पैसा शिक्षा पर लगाइए

आज जरूरत इस बात की है कि माता-पिता बेटियों को दहेज की जगह वे चीजें दें, जो पूरी जिंदगी उनके साथ रहें। इनमें सबसे पहली और सबसे अहम है शिक्षा। जो पैसा कई परिवार शादी और दहेज पर खर्च कर देते हैं, अगर उसका बड़ा हिस्सा बेटी की पढ़ाई, स्किल्स और करियर पर लगाया जाए, तो वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है।

एक शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला के पास अपने फैसले खुद लेने की ताकत होती है। उसे सम्मान पाने के लिए किसी दहेज की जरूरत नहीं पड़ती।

2. खूब सारा प्यार और आत्मसम्मान

दूसरी चीज है खूब सारा प्यार और आत्मसम्मान की सीख। अक्सर लड़कियां ऐसे माहौल में बड़ी होती हैं, जहां उन्हें हर बात सह जाने की सलाह दी जाती है। शादी के बाद अगर कोई उनसे ऊंची आवाज में बात करे, उन्हें नीचा दिखाए या मानसिक रूप से परेशान करे, तो वे इसे सामान्य मानने लगती हैं।

इसलिए जरूरी है कि बेटी को बचपन से ही यह समझाया जाए कि सम्मान उसका अधिकार है। उसे यह एहसास होना चाहिए कि किसी भी रिश्ते में अपमान या डर के लिए कोई जगह नहीं होती।

3. माता-पिता का अटूट सपोर्ट

तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण चीज है माता-पिता का अटूट साथ। हर बेटी को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि अगर कभी उसे किसी मुश्किल का सामना करना पड़े, तो उसके माता-पिता हर हाल में उसके साथ खड़े रहेंगे। उसे यह सोचकर चुप नहीं रहना चाहिए कि समाज क्या कहेगा या मायके वाले क्या सोचेंगे।

जब बेटियों को यह पता होता है कि उनके लिए घर के दरवाजे हमेशा खुले हैं, तभी वे गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने का साहस जुटा पाती हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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