उत्तराखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
ज्येष्ठ के महीने में हो रही लगातार बारिश ने पहाड़ी इलाकों के बागवानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यह वही समय है जब बगीचों में आडू और पुलम की फसलें लगभग पककर तैयार हो चुकी हैं, लेकिन बदले हुए मौसम ने मेहनत पर पानी फेरना शुरू कर दिया है।
तेज हवाओं और ओलों से गिर रहे फल
इन दिनों तेज हवाओं और ओलावृष्टि की वजह से तैयार फल पेड़ों से टूटकर जमीन पर गिर रहे हैं। ओले पड़ने से फलों पर निशान बन जाते हैं, जिससे उनकी कुदरती चमक खत्म हो जाती है। लगातार बने गीले मौसम के चलते फलों में सड़न का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है।
सही समय पर बारिश जरूरी, बेवक्त नुकसानदेह
देहरादून के बागवान डॉ. प्रेमचंद शर्मा बताते हैं कि फसल के लिए बारिश का होना बेहद जरूरी है, लेकिन यही बारिश अगर गलत वक्त पर हो जाए तो किसानों के लिए अभिशाप से कम नहीं रहती।
त्वचा छिलना सबसे बड़ी समस्या
उनके मुताबिक ढलान वाले इलाकों में ओले गिरने से फलों की त्वचा छिल जाती है। इसी छिली हुई सतह से फलों में फंगस या बैक्टीरियल संक्रमण फैलने लगता है, जो पूरी फसल की गुणवत्ता को प्रभावित कर देता है।
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