ओपिनियन: नेताजी, आखिर यूपी-बिहार वालों की मेहनत से आपको इतनी तकलीफ क्यों है? राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 9
महाराष्ट्र में टैक्सी और कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता ने रोजगार और संवैधानिक अधिकारों पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। यह लेख उन मेहनतकश लोगों की व्यथा को दर्शाता है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए किसी के रहम पर नहीं, बल्कि अपने पसीने की कमाई पर निर्भर हैं।

महाराष्ट्र में भाषा और रोजगार का नया विवाद

महाराष्ट्र में ऑटो, टैक्सी और ऐप-आधारित कैब ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का बुनियादी ज्ञान अनिवार्य करने के सरकारी आदेश ने एक गंभीर विवाद को जन्म दे दिया है। इस फैसले के खिलाफ चार कैब ड्राइवरों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है। अब यह मामला केवल एक भाषा सीखने या न सीखने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह रोजगार के अधिकार, प्रवासी मजदूरों की आजीविका और भारत के संविधान द्वारा प्रदान किए गए समानता के अधिकारों का केंद्र बन गया है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्या कारण है कि महाराष्ट्र में मेहनत करने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को बार-बार 'बाहरी' का तमगा देकर उन पर राजनीति की जाती है?

क्या रोजगार का संबंध भाषा से है?

महाराष्ट्र सरकार का यह नियम लागू होने के बाद स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा होता है कि कोई भी प्रशासन आजीविका जैसे गंभीर विषय को भाषा और पहचान की संकीर्ण राजनीति से कैसे जोड़ सकता है। हाईकोर्ट में दी गई याचिका में ड्राइवरों ने तर्क दिया है कि भाषा की यह शर्त लाखों चालकों के रोजगार को सीधे तौर पर खतरे में डाल सकती है। यह मसला इसलिए अहम है क्योंकि इसके केंद्र में सिर्फ मराठी भाषा का मुद्दा नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या किसी राज्य में अपनी मेहनत से पेट भरने वाले व्यक्ति की काबिलियत का पैमाना उसकी भाषाई योग्यता होगी? क्या एक ऑटो या कैब चालक का मुख्य काम यात्रियों को उनकी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचाना नहीं है? भाषा निसंदेह किसी भी समाज की संस्कृति, गरिमा और पहचान का अभिन्न अंग है। मराठी भाषा का सम्मान उतना ही जरूरी है जितना कि हिंदी, बंगाली, तमिल, भोजपुरी या पंजाबी का। लेकिन, भाषा के प्रति सम्मान और भाषा के नाम पर रोजगार के रास्ते में दीवार खड़ी करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

पहचान की राजनीति का बड़ा प्रभाव

याचिका में दी गई जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र में लगभग 9.65 लाख ऑटो-रिक्शा और टैक्सी परमिट और बैज जारी किए गए हैं। यह कोई मामूली प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर लगभग 10 लाख परिवारों की रोजी-रोटी पर पड़ने की संभावना है। याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इनमें से एक बड़ी संख्या उन गरीब प्रवासी मजदूरों की है जो सालों से यहां मेहनत कर रहे हैं। यदि भाषा की अनिवार्य शर्त पूरी न कर पाने के कारण किसी का बैज निलंबित या परमिट रद्द होता है, तो यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं रहेगी, बल्कि यह सीधे तौर पर परिवार के भरण-पोषण पर हमला होगा।

यूपी-बिहार के लोगों के खिलाफ क्यों है नफरत?

महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं से अब यह पूछने का समय आ गया है कि उन्हें उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों से आखिर इतनी नफरत क्यों है? जब भी कोई प्रवासी महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे या ठाणे जैसे शहरों में मेहनत करने आता है, तो वह एक 'बाहरी' कैसे बन जाता है? जब वह व्यक्ति सुबह उठकर अपना ऑटो लेकर सड़क पर निकलता है, तो वह किसी दूसरे का हक नहीं छीन रहा होता। वह तो अपनी मेहनत के बदले कुछ पैसे कमा रहा होता है। वह न तो किसी पर एहसान कर रहा है और न ही उसे किसी की दया की जरूरत है। यह एक आर्थिक लेनदेन है, जहाँ श्रम और सेवा का आदान-प्रदान होता है।

मेहनत ही उनकी एकमात्र पूंजी है

भारत का आर्थिक इतिहास इसी तरह की आवाजाही और प्रवासन की नींव पर टिका है। मुंबई यदि देश की आर्थिक राजधानी कही जाती है, तो इसके पीछे सिर्फ बड़ी कंपनियों, शेयर बाजार या गगनचुंबी इमारतों का हाथ नहीं है। इस शहर की धड़कन तो वे लाखों कामगार हैं जो बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और देश के हर कोने से यहां आए हैं। किसी भी शहर की अर्थव्यवस्था उसके निवासियों के बीच कड़ी दीवारें खींचने से नहीं, बल्कि लोगों के आने-जाने और उनके सहयोग से फलती-फूलती है। जब आप लोगों को 'हम' और 'वे' में बांट देते हैं, तो इससे राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन समाज का ढांचा कमजोर हो जाता है।

राजनीतिक एजेंडे और हकीकत का अंतर

अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए यह सबसे आसान तरीका है कि जनता को भाषाई आधार पर बांट दिया जाए। यह कहना कि 'हमारे रोजगार पर यूपी-बिहार वालों का कब्जा है', एक बहुत ही सुविधाजनक फार्मूला है। लेकिन, असली समस्याओं पर चर्चा करना कठिन है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में रोजगार के अवसर क्यों नहीं बढ़ रहे? छोटे व्यवसायों पर दबाव क्यों है? शहरों में किराया आसमान क्यों छू रहा है? सार्वजनिक परिवहन की हालत सुधरी क्यों नहीं है? इन जटिल सवालों के जवाब देने के बजाय एक बाहरी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहरा देना हमेशा आसान होता है।

कानूनी तौर पर प्रताड़ना का डर

महाराष्ट्र में लगातार उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों, विशेषकर कैब ड्राइवरों और डिलीवरी करने वाले युवाओं को निशाना बनाया जाता रहा है। कभी उनसे मराठी बोलने के लिए मारपीट की जाती है, तो कभी वीडियो बनाकर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है। अब तक यह प्रताड़ना राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित थी, लेकिन अब इसे सरकारी नियमों के जरिए कानूनी जामा पहनाया जा रहा है। यह प्रवृत्ति खतरनाक है। यूपी-बिहार के लोग अक्सर एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने नहीं आते, क्योंकि उनकी पहली प्राथमिकता अपने परिवार का पेट पालना होती है। उनकी इसी मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें 'बाहरी' बताकर निशाना बनाया जाता है।

संविधान का अधिकार और उम्मीद

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में रहने, बसने और अपनी पसंद का पेशा चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। याचिकाकर्ताओं ने भी संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का हवाला दिया है, जो समानता, व्यवसाय की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार की रक्षा करते हैं। अंततः, न्यायालय इस पूरे मामले में क्या निर्णय लेती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन सामाजिक स्तर पर यह प्रश्न हर जागरूक नागरिक के सामने है कि क्या भाषा को रोजगार की दीवार बना देना वास्तव में किसी राज्य का भला कर सकता है? मराठी भाषा को बढ़ावा देना स्वागत योग्य है, और इसके लिए सरकार मुफ्त कक्षाएं या प्रशिक्षण कार्यक्रम चला सकती है, लेकिन इसे रोजगार छीनने का हथियार बना लेना बेहद चिंताजनक है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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