उज्जैन: महाकाल को अर्पित फूलों से बन रहे अगरबत्ती और गुलाल, कई लोगों को मिला रोजगार मध्य प्रदेश 8 घंटे पहले 3
उज्जैन के मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों को रिसाइकिल कर अगरबत्ती, धूप, गुलाल और गुलाब जल जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इस पहल से जहां पर्यावरण संरक्षण हो रहा है, वहीं महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर भी मिल रहा है।

मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में सैकड़ों मंदिर हैं, जहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्री महाकालेश्वर मंदिर समेत अन्य मंदिरों में अर्पित होने वाले फूलों को अब फेंका नहीं जाता, बल्कि इनका उपयोग एक अनूठे ढंग से किया जा रहा है। पहले श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले हजारों किलो फूल कचरे के रूप में डंपिंग ग्राउंड पहुंचते थे और इनका निस्तारण एक बड़ी चुनौती बना हुआ था।

अब इन्हीं फूलों को रिसाइकिल कर अगरबत्ती, धूप, गुलाल और कई अन्य उत्पादों में बदला जा रहा है। इससे एक ओर पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है, तो दूसरी ओर महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर भी मिल रहा है। उज्जैन में आस्था के ये फूल अब कचरा नहीं, बल्कि रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का माध्यम बनते जा रहे हैं।

मंदिर समितियों के सहयोग से चल रही पहल

पुष्पांजलि इकोनिर्मित प्लांट के संस्थापक मनप्रीत सिंह अरोरा बताते हैं कि नगर निगम, स्वयं सहायता समूहों और महाकाल सहित कई मंदिर समितियों के सहयोग से यह अनूठी पहल संचालित की जा रही है। मंदिरों से एकत्र किए गए इस्तेमाल हो चुके फूलों को यहां रिसाइकिल कर धूपबत्ती, अगरबत्ती, गुलाब जल, अष्टगंध और होली का गुलाल जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यह मॉडल आस्था, स्वच्छता और आत्मनिर्भरता का सुंदर उदाहरण बन चुका है।

अनूठी पहल से मिल रहा रोजगार

उनके अनुसार, पुष्पांजलि इकोनिर्मित प्लांट में प्रतिदिन 3.5 से 5 मीट्रिक टन फूलों को रिसाइकिल करने की क्षमता है। यहां 20 लोगों की टीम कार्यरत है, जिनमें 16 महिलाएं और चार पुरुष शामिल हैं। यह टीम फूलों के संग्रहण से लेकर उत्पाद निर्माण और पैकेजिंग तक की पूरी प्रक्रिया संभालती है।

मंदिरों से प्राप्त फूलों को प्लांट में लाने के बाद सबसे पहले उनकी छंटाई की जाती है। इस दौरान प्लास्टिक, धागे, पत्तियां और अन्य अनुपयोगी सामग्री को अलग कर फूलों को आगे की प्रक्रिया के लिए तैयार किया जाता है।

पर्यावरण संरक्षण का संदेश

मनप्रीत सिंह अरोरा आगे बताते हैं कि फूलों के पुन: उपयोग की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले फूलों को प्राकृतिक धूप में सुखाकर उनकी नमी पूरी तरह समाप्त की जाती है। इसके बाद सूखे फूलों को आधुनिक मशीनों की मदद से प्रोसेस कर बारीक पाउडर और अन्य आवश्यक मिश्रण तैयार किए जाते हैं। इन्हीं से धूपबत्ती, अगरबत्ती, गुलाल, गुलाब जल और अष्टगंध जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं।

इन उत्पादों की कीमत 50 से 100 रुपये के बीच रखी गई है। खास बात यह है कि सभी उत्पादों की पैकेजिंग बायोडिग्रेडेबल सामग्री में की जाती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। इस पहल ने धार्मिक फूलों के कचरे से होने वाले प्रदूषण को कम करने के साथ-साथ रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा किए हैं।

फूलों से बने ये उत्पाद मंदिरों के आसपास और ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं। संस्थापक ने लोगों से अपील की है कि वे पूजा के फूलों को नदियों में न फेंकें, बल्कि उन्हें रिसाइक्लिंग के लिए यूनिट तक पहुंचाएं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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