रासायनिक DAP-NPK को टक्कर देगी यह देसी खाद, खेत की मिट्टी बनेगी उपजाऊ और लागत होगी लगभग शून्य मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
कृषि विभाग के उप-संचालक के अनुसार गोबर और जैविक अवशेषों से 'इंदौर विधि' द्वारा तैयार देसी खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और खेती की लागत को लगभग शून्य कर देती है।

अगर आप भी अपने खेतों में बिना सोचे-समझे DAP और NPK जैसी रासायनिक खादों का बेतहाशा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है। ये खादें न केवल आपकी जेब पर भारी पड़ रही हैं, बल्कि लंबे समय में आपके खेत की मिट्टी को बंजर बनाने का काम भी कर रही हैं। चंबल संभाग के किसानों के लिए अब एक राहत भरी जानकारी सामने आई है, जिससे खेती की लागत लगभग शून्य की जा सकती है और मिट्टी की सेहत भी सुधारी जा सकती है।

कृषि विभाग के उप-संचालक पान सिंह ने बताया कि गोबर और जैविक अवशेषों से तैयार होने वाली देसी खाद फसलों को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ भूमि की उर्वरक शक्ति को भी बनाए रखती है।

रासायनिक और जैविक खाद में अंतर

विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक खादें फसलों को तुरंत पोषण तो देती हैं, लेकिन लगातार केवल इन्हीं पर निर्भर रहने से मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इसके उलट गोबर और जैविक कचरे से बनी खाद मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ाती है, जिससे भूमि की संरचना और उर्वरता दोनों बेहतर बनी रहती हैं।

'इंदौर विधि' से तैयार करें देसी खाद

ग्रामीण इलाकों में इस प्रक्रिया को आमतौर पर 'घूरा लगाना' या 'कचरे का गड्ढा' कहा जाता है। वैज्ञानिक भाषा में यही तरीका 'इंदौर विधि' के नाम से जाना जाता है। इस विधि से तीन से चार महीने में अच्छी गुणवत्ता वाली कंपोस्ट खाद तैयार हो जाती है।

1. सही जगह का चुनाव

सबसे पहले खेत या घर के पास ऐसी जगह तय करें, जहां बारिश का पानी इकट्ठा न होता हो। हो सके तो पेड़ की छाया वाली जगह चुनें। गड्ढे की गहराई करीब तीन फीट रखें, जबकि लंबाई और चौड़ाई जरूरत के हिसाब से तय की जा सकती है।

2. परतों में भरें सामग्री

गड्ढे में सामग्री को अलग-अलग परतों में भरें। सबसे नीचे सूखी घास, पत्तियां या फसल अवशेष रखें और उसके ऊपर गोबर तथा गीला जैविक कचरा डालें। बीच-बीच में थोड़ी मिट्टी या राख छिड़कते रहें, इससे खाद जल्दी बनती है और दुर्गंध भी कम होती है।

3. नमी बनाए रखें

गड्ढे में समय-समय पर हल्का पानी छिड़कते रहें ताकि नमी बनी रहे, लेकिन ध्यान रहे कि पानी जरूरत से ज्यादा न हो। गड्ढा पूरी तरह भर जाने पर उसे मिट्टी और गोबर के मिश्रण से ढक दें।

4. पलटाई के बाद तैयार होगी खाद

करीब एक से सवा महीने बाद गड्ढे की एक बार पलटाई करें ताकि उसमें पर्याप्त हवा पहुंच सके। लगभग तीन से चार महीने में गहरे भूरे या काले रंग की भुरभुरी खाद बनकर तैयार हो जाती है। तैयार खाद की पहचान यह है कि उसमें से कोई बदबू नहीं आती, बल्कि मिट्टी जैसी सोंधी खुशबू महसूस होती है।

किसानों को क्या होगा फायदा?

उप-संचालक पान सिंह के मुताबिक जैविक खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाने में मदद करती है, जिससे भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है और फसलें लंबे समय तक नमी प्राप्त कर पाती हैं। इसके साथ ही सिंचाई की जरूरत भी कुछ हद तक घट सकती है।

रासायनिक और जैविक खादों का संतुलित इस्तेमाल करके किसान मिट्टी की सेहत बनाए रखते हुए टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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