डीके शिवकुमार बने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री, सोनिया गांधी ने दी सबको साथ लेकर चलने की नसीहत राष्ट्रीय राजनीति 57 मिनट पहले 3
कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को सोनिया गांधी ने सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी है, जिसे सिद्धारमैया को किनारे करने की कोशिशों पर हाईकमान के वीटो के रूप में देखा जा रहा है। उसी दिन सिद्धारमैया को सीडब्ल्यूसी में जगह देकर पार्टी ने संतुलन साधने का प्रयास किया।

कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से कुछ ही घंटे पहले डीके शिवकुमार को एक फोन आया, जिसने उन्हें सिर्फ बधाई नहीं दी, बल्कि आने वाले दिनों की सियासत का खाका भी खींच दिया। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद की शुभकामनाएं देने के साथ ही सबको साथ लेकर चलने की नसीहत दी।

सोनिया गांधी की यह सलाह इसलिए मायने रखती है, क्योंकि राहुल गांधी की जिद के सामने सिद्धारमैया को झुकना पड़ा और शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। सोनिया गांधी बखूबी जानती हैं कि अगर सिद्धारमैया को हाशिये पर डालने की कोशिश हुई, तो इसका खामियाजा खुद कांग्रेस को उठाना पड़ेगा। यही वजह है कि शिवकुमार के कुर्सी संभालते ही उन्होंने उन्हें उनका ‘धर्म’ याद दिला दिया।

सिर्फ बधाई नहीं, एक राजनीतिक संदेश

डीके शिवकुमार लंबे अरसे से मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदारों में गिने जाते रहे हैं। साल 2023 में कांग्रेस की जीत के बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर उनके और सिद्धारमैया के बीच खींचतान खुलकर सामने आ गई थी। उस समय पार्टी नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा और सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री तथा शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर बीच का रास्ता निकाला गया था।

अब हालात बदल चुके हैं। शिवकुमार मुख्यमंत्री बन गए हैं, मगर कांग्रेस नेतृत्व यह अच्छी तरह समझता है कि कर्नाटक कांग्रेस में कई शक्ति केंद्र सक्रिय हैं। ऐसे में सोनिया गांधी का सबको साथ लेकर चलने वाला संदेश दरअसल सत्ता के भीतर तालमेल बनाए रखने की हिदायत के तौर पर देखा जा रहा है।

कांग्रेस को क्यों रहना होगा सतर्क

कर्नाटक कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका विविध सामाजिक और राजनीतिक ढांचा है, लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। पार्टी में जहां एक ओर सिद्धारमैया समर्थक खेमे का दबदबा है, वहीं दूसरी ओर शिवकुमार का अपना मजबूत संगठनात्मक तंत्र है। इसके अलावा क्षेत्रीय नेताओं, जातीय समीकरणों और मंत्रिमंडल को लेकर उठने वाली महत्वाकांक्षाओं का दबाव भी बना रहेगा।

दिल्ली का नेतृत्व नहीं चाहता कि सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद गुटबाजी की खबरें सुर्खियों में आने लगें। इसी वजह से शपथ ग्रहण से पहले ही एक तरह से यह संदेश दे दिया गया कि मुख्यमंत्री बनने का अर्थ अकेले फैसले लेना नहीं, बल्कि पूरी पार्टी को साथ लेकर आगे बढ़ना है।

सिद्धारमैया को सीडब्ल्यूसी में जगह, संतुलन की कोशिश?

गौर करने वाली बात यह है कि जिस दिन शिवकुमार मुख्यमंत्री पद संभाल रहे थे, उसी दिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) में शामिल किए जाने की घोषणा भी कर दी गई। राजनीतिक विश्लेषक इसे महज इत्तेफाक नहीं मान रहे। एक तरफ शिवकुमार को राज्य की कमान सौंपी गई, तो दूसरी तरफ सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका देकर सम्मानजनक स्थान दिया गया। इस तरह कांग्रेस ने दोनों नेताओं के बीच संतुलन बैठाने की कोशिश की है।

रणदीप सिंह सुरजेवाला ने सिद्धारमैया को पार्टी की बड़ी ताकत बताते हुए जिस अंदाज में उनकी तारीफ की, उससे भी यही संकेत मिला कि कांग्रेस नेतृत्व किसी एक नेता को आगे बढ़ाकर दूसरे को हाशिये पर धकेलने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।

शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

डीके शिवकुमार को संगठन चलाने वाला नेता माना जाता है। संकट के समय पार्टी को संभालने से लेकर विधायकों को एकजुट रखने तक, उन्होंने कई मौकों पर अपनी राजनीतिक कुशलता साबित की है। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। उन्हें केवल प्रशासन ही नहीं चलाना है, बल्कि पार्टी के भीतर अलग-अलग गुटों को भी संतुष्ट रखना होगा।

मंत्रिमंडल का गठन, बोर्ड और निगमों में नियुक्तियां, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और चुनावी वादों को अमल में लाने जैसे कई मोर्चे उनके सामने खड़े होंगे। अगर इनमें कहीं भी असंतुलन पैदा हुआ, तो विपक्ष से ज्यादा बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर से ही उभर सकती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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