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2 घंटे पहले
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संसद परिसर में प्रदर्शन और चंदा वसूली
अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे की राशि को लेकर लगे चोरी के आरोपों पर समाजवादी पार्टी का विरोध प्रदर्शन अब अपने अंतिम चरण में है। संसद के मॉनसून सत्र के समापन से ठीक पहले सपा के सांसदों ने संसद परिसर में एक अनोखा विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने वहां दानपात्र रखकर लोगों से चंदा जुटाया और दावा किया कि पिछले दो हफ्तों के दौरान उन्होंने कुल 1.57 लाख रुपये की राशि एकत्रित की है।
बोरी में भरकर संसद पहुंचे सांसद
बुधवार को सपा के सांसद इस एकत्रित की गई रकम को एक बोरी में भरकर संसद भवन परिसर में लेकर आए। इस दौरान उन्होंने बेहद तीखे तेवर अपनाते हुए दावा किया कि यदि इस धन को राम मंदिर के ट्रस्ट को सौंपा गया, तो वहां भी इसके चोरी होने का पूरा अंदेशा बना हुआ है। समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही संसद का मॉनसून सत्र समाप्त होगा, वे इस पूरी राशि को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर में जाकर दान कर देंगे।
अवधेश प्रसाद बोले- श्रद्धालुओं की संख्या में भारी गिरावट
अयोध्या से निर्वाचित सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रद्धालुओं की संख्या को लेकर सनसनीखेज बयान दिए हैं। उनका कहना है कि मंदिर में चोरी की खबरों के सार्वजनिक होने के बाद से वहां दर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या में काफी कमी आई है। उन्होंने दावा किया कि पहले जहां मंदिर में प्रतिदिन करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता था, वह अब घटकर केवल कुछ लाख रुपये तक सीमित रह गया है।
प्रियंका गांधी का सरकार पर सीधा हमला
इस पूरे प्रकरण पर कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी ने भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी ने केवल चुनाव जीतने के लिए भगवान राम के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल किया। प्रियंका ने आगे कहा कि अब जब विपक्ष मंदिर में चढ़ावे के प्रबंधन और चोरी के आरोपों पर चर्चा की मांग कर रहा है, तो सत्ताधारी पक्ष इससे भाग रहा है और कोई भी जवाब देने से बच रहा है।
मंदिर प्रबंधन में बड़े बदलाव की आहट
चढ़ावे से जुड़े विवादों के बीच अब राम मंदिर की आंतरिक कार्यप्रणाली में बदलाव की कवायद भी शुरू हो गई है। जानकारी के अनुसार, राम मंदिर ट्रस्ट अब एक प्रोफेशनल सीईओ की नियुक्ति करने की तैयारी में है, जिसके लिए इंटरव्यू की प्रक्रिया भी चल रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक प्रमुख अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है। वहीं दूसरी ओर, बीजेपी और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार इस विवाद को संभालने के लिए अपनी अलग रणनीति पर काम कर रही है।
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