मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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कभी मंच पर नाटकों में पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार निभाने वाला युवक आज असल जिंदगी में पुलिस के कर्तव्य, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक सामंजस्य को एक साथ साधते हुए हजारों-लाखों पुलिसकर्मियों के लिए प्रेरणा बन गया है। सागर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लोकेश कुमार सिन्हा को उनके उत्कृष्ट प्रशासनिक कौशल, अनुशासित कार्यशैली और अपराध नियंत्रण में प्रभावी भूमिका के लिए रुस्तम जी पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। यह सम्मान सागर पुलिस के लिए बड़े गर्व और गौरव की बात मानी जा रही है।
किस घटना ने दिलाया रुस्तम जी पुरस्कार
वर्ष 2024 में रंग पंचमी की रात सागर के कैंट क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़क उठा था। उस समय लोकेश कुमार सिन्हा ने खुद मोर्चा संभालकर कानून-व्यवस्था को काबू में किया। रातभर में ही सभी आरोपियों की घेराबंदी कर उन्हें पकड़ लिया गया, जिससे एक बड़ी घटना होते-होते टल गई। इसी कार्रवाई के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें रुस्तम जी पुरस्कार देने की घोषणा की है। इस प्रतिष्ठित सम्मान के तहत उन्हें ₹50000 नगद और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा।
अब तक का सफर
लोकेश कुमार सिन्हा मूल रूप से इंदौर के रहने वाले हैं। उन्होंने साइंस कॉलेज से बीएससी मैथमेटिक्स की पढ़ाई की है। शुरुआत में उन्होंने सब इंस्पेक्टर बनने की तैयारी की, लेकिन दो बार असफलता हाथ लगने के बाद उन्होंने ठान लिया कि अब इस दिशा में आगे नहीं बढ़ेंगे। इसके बाद उन्होंने पीएससी की राह पकड़ी और पहले ही प्रयास में सफलता हासिल करते हुए डीएसपी के पद पर चयनित हो गए।
वर्ष 2011 में चयन के बाद सागर स्थित जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी में उनकी ट्रेनिंग हुई। पहली पोस्टिंग भिंड जिले में मिली, इसके बाद वे बालाघाट, भोपाल और जबलपुर में सेवाएं देते रहे और वर्तमान में लगभग 3 सालों से सागर में तैनात हैं।
खूंखार नक्सली को जिंदा पकड़ा
अपनी दूसरी पोस्टिंग के दौरान बालाघाट में एसडीओपी रहते हुए उन्होंने अपनी टीम के साथ 159 अपराध करने वाले खूंखार नक्सली दिलीप गुहा को जिंदा दबोच लिया था। इस नक्सली के खतरनाक होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उस पर तीन राज्यों की पुलिस ने 35 लाख का इनाम घोषित कर रखा था।
लोकेश कुमार बताते हैं कि यह नक्सली अपनी कोर कमेटी का इंचार्ज था और अपने परिवार से मिलने के लिए आ रहा था। जैसे ही इसकी सूचना मिली, घेराबंदी कर उसे पकड़ लिया गया और उसके पास से राइफल भी जब्त की गई। यह वर्ष 2014 की घटना है।
इन बड़े मामलों को किया हैंडल
इसी तरह भोपाल में पदस्थापना के दौरान 17 मई 2018 को भोपाल की कर्फ्यू वाली माता के पास हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ था, जिसमें तीन तरफ से मुस्लिम और एक तरफ से हिंदू आमने-सामने थे और बीच में लोकेश सिन्हा अपनी टीम के साथ डटे रहे। भीड़ को काबू करने के लिए फायरिंग करनी पड़ी और इसके बाद टियर गैस का इस्तेमाल किया गया। कोई बड़ी घटना न हो, इसके लिए रातभर टियर गैस चलाई गई और राहत की बात रही कि इतने बड़े दंगे के बावजूद कोई कैजुअल्टी नहीं हुई।
भोपाल की बैरागढ़ में 16 साल का एक बच्चा स्कूल से अपने घर नहीं लौटा था, जिसकी रिपोर्ट उसकी मां ने थाने में दर्ज कराई थी। पुलिस ने 363 कायम कर जांच-पड़ताल की, सीसीटीवी फुटेज में कुछ सुराग मिले और बाद में दूसरे थाना क्षेत्र में उसका शव बरामद हुआ। इस मामले में उनकी टीम ने बिट्टू रुपाणी को गिरफ्तार किया, जिसे कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस बेहतरीन विवेचना के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें एक्सीलेंस इन इन्वेस्टिगेशन अवार्ड से सम्मानित किया था।
परिवार और नौकरी के बीच संतुलन
पुलिस की नौकरी और परिवार के सामंजस्य पर लोकेश कुमार कहते हैं कि शुरुआत में निश्चित रूप से कुछ दिक्कतें आती थीं। न हमें ठीक से समझ आता था और न ही परिवार वालों को, एक-दूसरे को समय भी नहीं दे पाते थे। लेकिन धीरे-धीरे इन सब चीजों को मैनेज करना आ जाता है। उनका मानना है कि पुलिस की नौकरी का स्वरूप ही ऐसा है कि इसमें काफी समय देना पड़ता है, और जब परिवार इस व्यावहारिकता को समझ लेता है तो वह भी उसी हिसाब से खुद को एडजस्ट कर लेता है।
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