मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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सागर की ऐतिहासिक धरोहर पर संकट
मध्य प्रदेश का सागर शहर अपनी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहाँ की मिट्टी में प्रकृति के प्रति लोगों की गहरी आस्था रची-बसी है। इसी आस्था और धरोहरों के संरक्षण की कड़ी में सागर कलेक्ट्रेट परिसर में दो बेहद दुर्लभ कल्पवृक्ष मौजूद हैं। इन पेड़ों की आयु सैकड़ों साल पुरानी मानी जाती है, लेकिन अब इनमें से एक 700 साल पुराने कल्पवृक्ष के अस्तित्व पर गंभीर संकट पैदा हो गया है। हाल ही में हुई तेज आंधी और बारिश के कारण यह विशाल वृक्ष एक तरफ झुक गया है, जिससे प्रशासन के साथ-साथ स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों की चिंता बढ़ गई है।
प्रशासन की कार्यशैली और पेड़ों की स्थिति
सागर कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर स्थित ये दो कल्पवृक्ष अलग-अलग स्थानों पर हैं। एक वृक्ष कलेक्टर कार्यालय की इमारत के ठीक बीचों-बीच स्थित है, जबकि दूसरा मुख्य प्रवेश द्वार के बगल में मौजूद है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ साल पहले इन पेड़ों के आसपास कंक्रीट की सड़कें और चबूतरे बनाए गए थे। इस निर्माण कार्य के दौरान पेड़ों के आसपास की प्राकृतिक मिट्टी को हटा दिया गया, जिससे उनकी जड़ों को मिलने वाला पोषण प्रभावित हुआ। अब, भारी-भरकम आकार वाले इस प्राचीन पेड़ के एक ओर झुक जाने से इसके उखड़ने या गिरने का खतरा पैदा हो गया है, जो कि एक बड़ी दुर्घटना को भी न्योता दे सकता है। इसे देखते हुए फिलहाल प्रशासन ने एहतियातन पेड़ के चारों तरफ बैरिकेडिंग कर दी है।
संरक्षण के लिए उठने लगी आवाज
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहर के स्थानीय निवासी और विभिन्न हिंदू संगठन इस पेड़ को बचाने के लिए सक्रिय हो गए हैं। उनकी मांग है कि प्रशासन तुरंत प्रभाव से पेड़ की छंटाई (प्रूनिंग) करवाए और इसे वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करे। इस मामले में एसडीएम और अपर कलेक्टर ने पेड़ को सुरक्षित रखने का मौखिक आश्वासन दिया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में जब 27 एकड़ के परिसर में कलेक्ट्रेट की नई इमारत बनकर तैयार हुई थी, तब यह कल्पवृक्ष निर्माण कार्य के बीच में आ रहा था। उस दौरान वृक्ष को काटने के बजाय, उसे सुरक्षित बचाने के लिए प्रशासन ने कलेक्ट्रेट की बिल्डिंग का डिजाइन कुल तीन बार बदला था।
कल्पवृक्ष का वैज्ञानिक महत्व
सागर स्थित डॉक्टर हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग में 44 साल तक अपनी सेवाएं देने वाले प्रोफेसर अजय शंकर मिश्रा के अनुसार, यह वृक्ष अत्यंत दुर्लभ है। उनका मानना है कि पृथ्वी पर कभी गोंडवाना लैंड हुआ करता था, जहाँ कल्पवृक्ष पाए जाते थे। समुद्र में हुई भूगर्भीय गतिविधियों के कारण यह भूमि तीन हिस्सों में विभाजित हो गई, जिसके परिणामस्वरूप अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और भारतीय उपमहाद्वीप का निर्माण हुआ। इसी कारण कल्पवृक्ष केवल इन्हीं तीन भौगोलिक क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं। आप इस दुर्लभता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में केवल 7 कल्पवृक्ष हैं, जिनमें से 3 पेड़ अकेले सागर जिले में ही स्थित हैं। इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम 'एंडेनसोनिया डिजिटेटा' है और इसकी कुल 13 प्रजातियां दुनिया भर में पाई जाती हैं। इन पेड़ों की अधिकतम उम्र साढ़े 4 हजार साल तक हो सकती है, और इनमें पानी का एक विशाल प्राकृतिक स्रोत निहित होता है।
पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताएं
कल्पवृक्ष का उल्लेख हमारे प्राचीन पुराणों में मिलता है, जहाँ इसे अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना गया है। ज्योतिषाचार्य एवं कुंडली विशेषज्ञ पंडित शोभित शास्त्री महाराज बताते हैं कि श्रीमद्भगवद गीता में भी इस वृक्ष का जिक्र है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से कल्पवृक्ष भी एक था, जिसे देवराज इंद्र को सौंपा गया था। इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन वन में की थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र वृक्ष के नीचे सच्चे मन से खड़े होकर प्रार्थना करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में इसे एक अक्षय वृक्ष माना गया है, जिसका नाश कल्पांत तक नहीं होता। इस पेड़ की पत्तियां, फल और अन्य हिस्से औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं, जो इसे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अमूल्य बनाते हैं।
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