तिल की खेती से बदली आदिवासी किसानों की तकदीर, कम पानी और कम लागत में बंपर मुनाफा राजस्थान एक दिन पहले 8
राजस्थान के सिरोही जिले में आदिवासी किसान अब पारंपरिक खेती छोड़ तिल की वैज्ञानिक खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी आय में इजाफा हो रहा है।

सिरोही में तिल की खेती की नई लहर

राजस्थान का सिरोही जिला अब खेती के नए तरीकों को अपनाकर तरक्की की नई राह पर चल रहा है। जिले के सियावा गांव में कृषि विभाग की ओर से एक विशेष पहल की गई है, जिसके जरिए 25 आदिवासी किसानों को तिल की आधुनिक और उन्नत खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस मुहिम में बड़ी संख्या में महिला किसान भी शामिल हैं, जो अब खेती को एक मुनाफे के व्यवसाय के रूप में देख रही हैं।

वैज्ञानिक तकनीक का प्रशिक्षण

जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के मंडोर कृषि केंद्र से आए डॉ. बी.आर. चौधरी ने हाल ही में सियावा गांव की महिला काश्तकारों को तिल की उन्नत खेती के गुर सिखाए। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से रूबरू कराना था। कृषि विभाग की ओर से किसानों को आधुनिक खेती के लिए प्रेरित करने के साथ ही उन्नत किस्म के बीज, नैनो डीएपी खाद और खरपतवारनाशक दवाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं। इन संसाधनों की मदद से अब आदिवासी किसान पारंपरिक तरीकों से हटकर वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ खेती कर रहे हैं। कृषि अधिकारियों के अनुसार, यदि सही तरीके से प्रबंधन किया जाए, तो तिल एक ऐसी फसल है जो कम पानी और कम उपजाऊ जमीन पर भी शानदार पैदावार दे सकती है।

खेती की तैयारी और बुवाई का गणित

विशेषज्ञों का कहना है कि तिल की फसल के लिए मिट्टी का चयन सबसे महत्वपूर्ण है। रेतीली, दोमट और ऐसी मिट्टी जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, तिल के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। बुवाई के समय को लेकर कृषि अधिकारियों ने बताया कि खरीफ सीजन के दौरान जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के मध्य तक बुवाई करना सबसे सही होता है। इसके अलावा रबी सीजन में फरवरी से लेकर 15 मार्च तक तिल की बुवाई की जा सकती है।

खेत तैयार करने के लिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि बुवाई से पहले खेत की 2 से 3 बार गहरी जुताई करना बहुत जरूरी है ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो बरसात के दौरान खेत में पानी भरने का डर रहता है, जिससे फसल पूरी तरह बर्बाद हो सकती है। बीज की मात्रा पर ध्यान देते हुए उन्होंने बताया कि 1 एकड़ जमीन के लिए 1.5 से 3 किलोग्राम बीज ही पर्याप्त होता है। पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने के लिए कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखना बहुत आवश्यक है।

खाद और पानी का प्रबंधन

अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी करते समय पुरानी और अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालना बेहद फायदेमंद साबित होता है। बुवाई के वक्त किसान सिंगल सुपर फॉस्फेट और पोटाश का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। तिल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बहुत कम पानी की जरूरत होती है। खरीफ की फसल में यदि बारिश समय पर नहीं हो रही है, तभी सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। वहीं, गर्मी के मौसम में ली जाने वाली फसल के लिए करीब 4 से 5 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है।

कटाई का सही समय और उत्पादन

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, तिल की फसल कब तैयार हो गई है, यह जानने के लिए पौधों को देखना पर्याप्त है। जब पौधों की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगें और उन पर लगी डोड़ियां हरे रंग से बदलकर हल्की पीली दिखने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार है। कटाई के बाद फसल के गट्ठर बनाकर कुछ दिनों तक खेत में ही सुखाया जाता है। उसके बाद फसल को झटकने पर साफ बीज आसानी से निकल आते हैं। यदि किसान इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो 1 एकड़ की भूमि से लगभग 4 से 6 क्विंटल तक तिल का उत्पादन आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। बाजार में तिल की मांग और इसकी गुणवत्ता के कारण किसानों को बेहतरीन आर्थिक लाभ मिल रहा है, जिससे उनकी जीवनशैली में बड़ा बदलाव आ रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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