राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
बदलते कूटनीतिक समीकरण और भारत की नई पहल
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल हित स्थायी होते हैं। इस पुरानी कहावत को भारत एक बार फिर साबित कर रहा है। कभी पाकिस्तान और तुर्की के खेमे में खड़े रहने वाले अजरबैजान के साथ अब भारत अपने संबंधों की एक नई कहानी लिख रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अजरबैजान का दौरा किया, जिसे दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्री ने अजरबैजान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री से मुलाकात की और आपसी सहयोग को बढ़ाने पर गहन चर्चा की।
ऑपरेशन सिंदूर और अर्मेनिया का पहलू
अगर इतिहास और हालिया वैश्विक राजनीति पर नजर डालें तो ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत और अजरबैजान के संबंधों में काफी दूरी आ गई थी। उस दौरान अजरबैजान ने खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए थे। वहीं दूसरी तरफ, तुर्की भी हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस्लामाबाद का साथ देता रहा है। इस बीच, अजरबैजान के पड़ोसी और धुर विरोधी देश अर्मेनिया के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ सालों में काफी प्रगाढ़ हुए हैं। भारत आज अर्मेनिया को सैन्य हथियार और रक्षा उपकरण आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। अजरबैजान और अर्मेनिया के बीच पुरानी कट्टर दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद, भारत ने अपनी कूटनीतिक समझदारी से अजरबैजान के साथ भी संवाद के रास्ते खोले हैं।
दो बड़ी घटनाएं, जिन्होंने बदली हवा का रुख
भारत और अजरबैजान को करीब लाने में दो हालिया अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का बड़ा योगदान माना जा रहा है। इन वाकयों ने दोनों देशों के बीच वर्षों से बनी खाई को पाटने का काम किया है:
- संयुक्त राष्ट्र (UN) की बैठक का वाकया: संयुक्त राष्ट्र में जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपना संबोधन दे रहे थे, तब तुर्की और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम बहुल देशों के प्रतिनिधियों ने विरोध जताते हुए भाषण का बहिष्कार कर दिया था। हालांकि, अजरबैजान के राजनयिक उस दौरान पूरे समय हॉल में मौजूद रहे। भारतीय प्रतिनिधि भी इस दौरान बैठक में उपस्थित थे। अजरबैजान के इस रुख की तुर्की में काफी तीखी आलोचना भी हुई थी।
- बाकू में आयोजित CICA शिखर सम्मेलन: इसी साल 15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में एशिया में संवाद और विश्वास-निर्माण उपायों पर सम्मेलन (CICA) के 7वें शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन के दौरान जब इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग का संबोधन शुरू हुआ, तो कई इस्लामिक देशों ने एक बार फिर विरोध दर्ज कराते हुए बहिष्कार का रास्ता चुना। लेकिन इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत की ओर से विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह मौजूद रहे। अजरबैजान के इस तटस्थ और स्वतंत्र रवैये ने भारत के साथ उसकी नजदीकियां बढ़ाने में मदद की।
मौके पर चौका और जयशंकर का मास्टरस्ट्रोक
संयुक्त राष्ट्र और बाकू सम्मेलन में घटे इन घटनाक्रमों के बाद जब कूटनीतिक धरातल पर नरमी देखने को मिली, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सही अवसर भांपते हुए अजरबैजान की आधिकारिक यात्रा का फैसला किया। बाकू पहुंचे जयशंकर ने वहां के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें अजरबैजान के राष्ट्रपति और वहां के विदेश मंत्री शामिल हैं, के साथ सीधी वार्ता की। पाकिस्तान और तुर्की का साथ मिलने में आई कमी के बाद अजरबैजान अब अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, और भारत ने इसी मौके का फायदा उठाकर बाकू के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक सेतु को और मजबूत कर लिया है।
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