मनोरंजन
एक घंटा पहले
4
विचारों
एक अलग तरह की कहानी
फिल्म दूसरा को केवल एक फीचर फिल्म के तौर पर देखना गलत होगा, क्योंकि यह निर्देशक अभिनय देव का एक साहसिक डॉक्यू-फिक्शन प्रयोग है। फिल्म सीधे तौर पर 90 के दशक के उस दौर को पकड़ने की कोशिश करती है, जब भारत में क्रिकेट का क्रेज अपने चरम पर था और देश सामाजिक बदलावों के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा था।
फिल्म की मूल कहानी
इस फिल्म की पटकथा दो समानांतर धाराओं को एक साथ लेकर चलती है। एक तरफ लॉर्ड्स के मैदान पर भारतीय क्रिकेट टीम की वह ऐतिहासिक जीत है जिसने देश का गौरव बढ़ाया, तो दूसरी तरफ राजस्थान के एक सुदूर गांव की रहने वाली तारा की कहानी है। तारा एक आम लड़की है, जो अपने घर के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक ढांचे और दकियानूसी परंपराओं के खिलाफ अपनी छोटी सी बगावत शुरू करती है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे क्रिकेट की वह जीत पर्दे के पीछे एक युवती के मन में स्वतंत्रता की ललक जगाती है।
निर्देशन और कमियां
अभिनय देव का यह प्रयास सराहनीय है कि उन्होंने खेल के मैदान के रोमांच को सामाजिक संघर्षों के साथ जोड़ा। हालांकि, यह तालमेल फिल्म में पूरी तरह से उभर नहीं पाता है। खेल और व्यक्तिगत संघर्ष के बीच का जुड़ाव कई मौकों पर कमजोर महसूस होता है। दूसरा दर्शकों को एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाने का वादा तो करती है, लेकिन पटकथा के स्तर पर कुछ हिस्से अधूरे रह जाते हैं। क्रिकेट के प्रति जुनूनी दर्शक और सामाजिक विषयों पर रुचि रखने वाले दर्शक, दोनों ही वर्गों को फिल्म का पेसिंग थोड़ा धीमा लग सकता है।
क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?
यदि आप सिनेमा में कुछ नया और लीक से हटकर प्रयोग देखना पसंद करते हैं, तो दूसरा एक बार देखी जा सकती है। यह फिल्म 90 के दशक की यादें ताजा करती है और यह बताने की कोशिश करती है कि कैसे एक खेल ने समाज के मानस को प्रभावित किया था। तकनीकी और कथात्मक रूप से इसमें कुछ बड़ी चूकें जरूर हैं, लेकिन यह उन लोगों के लिए एक कोशिश है जो खेल के जरिए जीवन के संघर्षों को देखना चाहते हैं।
Comments
0 comment