ऋषिकेश की बदली तस्वीर: कभी बद्रीनाथ जाने वाले तीर्थयात्रियों का मुख्य रास्ता हुआ करता था यह इलाका उत्तराखंड 2 घंटे पहले 3
ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट के आसपास का इलाका, जो आज बाजारों और भीड़भाड़ से भरा हुआ है, कभी बद्रीनाथ धाम की कठिन पैदल यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था। समय के साथ शहर के विकास ने इस ऐतिहासिक रास्ते की पहचान पूरी तरह से बदल दी है।

ऋषिकेश का वह पुराना रास्ता जो अब यादों में सिमट गया है

आज जिस ऋषिकेश को हम आधुनिक सुविधाओं, बाजारों और तीर्थयात्रियों की लगातार चहल-पहल के साथ देखते हैं, उसकी एक बहुत ही गहरी और दिलचस्प ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। विशेषकर त्रिवेणी घाट के आसपास का वह इलाका, जो आज शहर की भागदौड़ का केंद्र बन चुका है, कभी बद्रीनाथ धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए आवागमन का एकमात्र मुख्य मार्ग हुआ करता था। उस दौर की तस्वीरें आज जब हम देखते हैं, तो यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि जिन सड़कों पर आज वाहन दौड़ रहे हैं और जहां बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हैं, वहां से कभी पैदल तीर्थयात्री अपना दुर्गम सफर तय करते थे।

श्रद्धालुओं के लिए एक कठिन लेकिन भक्तिमय सफर

पुराने समय में बद्रीनाथ की यात्रा करना वर्तमान के मुकाबले बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। आज की तरह पक्की सड़कें, तेज रफ्तार परिवहन के साधन और जगह-जगह मौजूद होटल उस समय नहीं हुआ करते थे। श्रद्धालु कई दिनों तक पैदल चलकर पहाड़ों के बीच से गुजरते थे। ऋषिकेश से शुरू होने वाला यह सफर उस समय की तीर्थ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। तीर्थयात्री जब ऋषिकेश से आगे पहाड़ों की ओर बढ़ते थे, तो वे इसी रास्ते का सहारा लेते थे। उन दिनों में रास्ते केवल आवाजाही का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे पूरी यात्रा की साधना का हिस्सा हुआ करते थे। आज की आधुनिक जीवनशैली में उस समय के उस कठिन और धीमे सफर की कल्पना करना भी थोड़ा कठिन लगता है।

बाजार और आधुनिक निर्माण का प्रभाव

जैसे-जैसे समय बीतता गया, ऋषिकेश का स्वरूप तेजी से बदलने लगा। शहर की आबादी बढ़ी और पर्यटकों का आकर्षण इस शहर की ओर और अधिक होने लगा। इसका सीधा असर पुराने रास्तों और खुले इलाकों पर पड़ा। जिस स्थान से कभी श्रद्धालु भक्तिभाव के साथ बद्रीनाथ की ओर प्रस्थान करते थे, वहां धीरे-धीरे दुकानें, बाजार और पक्की सड़कें बन गईं। आज त्रिवेणी घाट के आसपास जो चहल-पहल दिखाई देती है, उसने पुराने जमाने के उस शांत और सादगी भरे रास्ते को पूरी तरह से ओझल कर दिया है। आज वहां आधुनिक निर्माण की छाप इतनी गहरी है कि वहां से गुजरने वाले किसी भी व्यक्ति को यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल है कि यह स्थान कभी एक महत्वपूर्ण पैदल तीर्थ मार्ग हुआ करता था।

बदलाव का गवाह है ऋषिकेश

ऋषिकेश की पहचान हमेशा से गंगा, आध्यात्म और पर्यटन के इर्द-गिर्द घूमती रही है। गंगा के तट पर आने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों ने शहर के विकास की गति को और तेज कर दिया। इसी विकास क्रम में त्रिवेणी घाट के आसपास का इलाका भी एक नई पहचान के साथ उभरा है। अब वहां न तो वैसी शांति है और न ही वो पुराना कच्चा मार्ग बचा है। फिर भी, इतिहास पूरी तरह से मिटता नहीं है। पुरानी तस्वीरों और स्थानीय बुजुर्गों की यादों के जरिए उस दौर की कहानी आज भी जीवित है। ये पुरानी तस्वीरें हमें बताती हैं कि पिछले कुछ दशकों में ऋषिकेश ने विकास का कितना लंबा सफर तय किया है।

क्या खोया और क्या पाया

ऋषिकेश की यह बदलती तस्वीर केवल एक रास्ते के लुप्त होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे शहर के बदलते दौर की एक झलक है। हमने आधुनिकता और सुख-सुविधाओं के नाम पर एक पुराने इतिहास को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, शहर का चेहरा जरूर बदला है, लेकिन ऋषिकेश का मूल स्वरूप, जो गंगा और तीर्थ के महत्व से जुड़ा है, वह आज भी कायम है। श्रद्धालु आज भी उसी श्रद्धा के साथ आते हैं, बस उनके आने के साधन और रास्ते बदल गए हैं। त्रिवेणी घाट की वही पवित्रता आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती है, चाहे बाजार की चमक-धमक कितनी भी बढ़ गई हो।

इतिहास की एक झलक

आज अगर हम उस समय के माहौल की कल्पना करें, तो हम पाएंगे कि वहां का दृश्य बहुत अलग था। न तो वहां दुकानों की कतारें थीं और न ही आज जैसा शोरगुल। इलाका खुला-खुला और सादा हुआ करता था। तीर्थयात्रियों की टोलियां जब इस रास्ते से गुजरती थीं, तो पूरे वातावरण में एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस की जा सकती थी। आज उस गौरवशाली अतीत को हम केवल तस्वीरों में ही देख पाते हैं। यह विकास हमें बताता है कि समय के साथ परिवर्तन अनिवार्य है, लेकिन हमें अपनी जड़ों और उस कठिन संघर्ष को भी याद रखना चाहिए जिससे यह स्थान आज इस मुकाम पर पहुंचा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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