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एक घंटा पहले
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विचारों
शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, देशव्यापी प्रोटोकॉल बनाने पर विचार
देश में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और उन पर होने वाली पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना नागरिकों का एक संवैधानिक अधिकार है और इसकी गारंटी स्वयं देश का संविधान देता है। अदालत ने कहा कि इस अधिकार को किसी भी परिस्थिति में नकारा या दबाया नहीं जा सकता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह पूरे देश में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के आयोजन और उनके नियमन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर के प्रोटोकॉल को तैयार करने पर विचार कर सकता है।
अदालत का मानना है कि इस प्रस्तावित प्रोटोकॉल के अंतर्गत ऐसे सुरक्षा उपाय और नियम होने चाहिए जिससे आंदोलनकारियों को प्रदर्शन के लिए एक उचित स्थान मिल सके। इसके साथ ही, इसके जरिए कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों और पुलिस बल को भी असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए आवश्यक अधिकार और सुविधाएं मिल सकें।
NEET-UG पेपर लीक प्रदर्शनों और पुलिस ज्यादतियों से जुड़ा है मामला
सुप्रीम कोर्ट में यह पूरी चर्चा उन विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान हुई, जिनमें विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता और अत्यधिक बल प्रयोग के गंभीर आरोप लगाए गए थे। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से NEET-UG पेपर लीक मामले और देश की शिक्षा व परीक्षा प्रणाली में सामने आई अन्य गंभीर गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठा रहे छात्रों का मुद्दा उठाया। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे छात्र-छात्राओं पर पुलिस प्रशासन द्वारा बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया गया और उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए। छात्रों के अधिकारों की रक्षा और आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर समग्र नीति और दृष्टिकोण की आवश्यकता
इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष बेंच द्वारा की जा रही है। छात्रों पर हुए कथित हमलों के खिलाफ दायर याचिकाओं की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह कर रहे थे।
दूसरी तरफ, सुनवाई के दौरान एक अन्य वकील ने अदालत का ध्यान एक अलग याचिका की ओर भी आकर्षित किया। इस याचिका में यह दलील दी गई कि कई बार उग्र और बेकाबू भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथ में ले लिया जाता है। याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनों के दौरान हिंसक भीड़ ने पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों पर बेहद क्रूरता से हमले किए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तीन जजों की बेंच ने टिप्पणी की कि इस मुद्दे को केवल किसी एक घटना के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इस पर राष्ट्रीय स्तर पर समग्र रूप से विचार करने की अत्यंत आवश्यकता है।
संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा के बीच संतुलन
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने साफ तौर पर कहा कि, "शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार भारतीय संविधान के तहत पूरी तरह से सुरक्षित और गारंटीकृत है। इस अधिकार से नागरिकों को वंचित नहीं किया जा सकता। केवल इसलिए कि कहीं कोई आंदोलन या प्रदर्शन चल रहा है, पुलिस द्वारा की जाने वाली ज्यादती या अत्यधिक बल प्रयोग को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।"
हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षाबलों और पुलिसकर्मियों पर होने वाले हमलों और हिंसा को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की। जब एक अधिवक्ता ने उग्र भीड़ के हमले में घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों पर आए संकट का उल्लेख किया, तो जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इस पर गंभीर रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मियों का घायल होना और उन पर हमला होना भी उतना ही गंभीर और चिंताजनक विषय है। उन्होंने आगे कहा कि कोर्ट इस संबंध में संबंधित राज्यों से जवाब तलब कर सकती है कि प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त और पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए थे।
एक समान राष्ट्रीय दिशानिर्देश की तैयारी
मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि पूरे देश के लिए एक सुव्यवस्थित प्रोटोकॉल की रूपरेखा तैयार होनी चाहिए। उनके अनुसार:
- जब भी कोई नागरिक या समूह शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाना चाहता है, तो उसके लिए एक स्पष्ट प्रोटोकॉल मौजूद होना चाहिए।
- शांतिपूर्ण आंदोलनों के लिए शहरों में उचित और निर्धारित स्थल होने चाहिए ताकि आम जनता को असुविधा न हो।
- प्रोटोकॉल के लागू होने से प्रदर्शनों के शांतिपूर्ण संचालन में कोई बाधा नहीं आएगी, लेकिन यदि आंदोलन में कोई असामाजिक तत्व शामिल होता है, तो पुलिस प्रशासन के पास उससे कड़ाई से निपटने के स्पष्ट अधिकार होंगे।
शीर्ष अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस विषय पर पूरे देश में एकरूपता लाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता है। अदालत इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए अब अगले दिन यानी मंगलवार को पुनः सुनवाई करेगी।
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