धान की फसल में बौनेपन का खतरा: किसान तुरंत अपनाएं ये उपाय, नहीं तो होगा भारी नुकसान मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 4
मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में धान की फसल में बौनेपन की बीमारी तेजी से फैल रही है, जिससे पैदावार घटने का खतरा पैदा हो गया है। विशेषज्ञों ने किसानों को समय रहते बचाव के तरीके अपनाने की सलाह दी है।

धान में बौनेपन की समस्या का संकट

मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के किसानों के लिए धान की फसल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यहाँ खेतों में धान के पौधों में बौनेपन के लक्षण देखे जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर फसल की उत्पादकता को प्रभावित कर सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। खेतों में फसल के विकास में आ रही इस बाधा को लेकर किसान काफी चिंतित हैं।

बौनेपन की मुख्य वजह क्या है?

किसान सलाहकार चंद्रभूषण पांडे के अनुसार, धान में यह समस्या मुख्य रूप से साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस के कारण पैदा हो रही है। यह वायरस एक विशेष कीट के जरिए फैलता है, जिसे वाइट बैक्ड प्लांट हॉपर या फुदका कहा जाता है। यह कीट संक्रमित पौधों का रस चूसता है और फिर स्वस्थ पौधों पर बैठकर इस वायरस को उनमें फैला देता है। इसके अलावा, जमीन में जिंक की कमी, जलभराव की स्थिति, जड़ों का सही ढंग से विकसित न हो पाना और यूरिया का गलत या असंतुलित उपयोग भी धान के पौधों की लंबाई को रोकने का मुख्य कारण बनते हैं।

बीमारी के पहचाने जाने वाले लक्षण

प्रभावित खेत में लगे पौधों को दूर से ही पहचाना जा सकता है। ये पौधे अपने सामान्य आकार की तुलना में काफी छोटे रह जाते हैं और गुच्छों के रूप में नजर आते हैं। पौधों की पत्तियां सामान्य के मुकाबले गहरे हरे रंग की, आकार में मोटी और कहीं-कहीं मुड़ी हुई दिखाई देती हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे पौधों में बालियां या तो निकलती ही नहीं हैं, और यदि निकलती भी हैं तो वे पूरी तरह खाली या खोखली होती हैं, जिससे पैदावार न के बराबर रह जाती है।

फसल को बचाने के लिए उपाय

कृषि सलाहकार अवनीश पटेल का कहना है कि इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका रसचूसक कीटों पर नियंत्रण करना है। कीटों के खात्मे के लिए विशेषज्ञों की राय लेते हुए ट्राइफ्लुमेज़ोपाइरिम, पाइमेट्रोज़िन या इमिडाक्लोप्रिड जैसी कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जा सकता है। जिंक की कमी को दूर करने के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 1 प्रतिशत यूरिया के घोल का पत्तियों पर छिड़काव करना काफी फायदेमंद साबित होता है।

विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण सलाह

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कुछ अन्य जरूरी सावधानियां बरतने को भी कहा है:

  • खेत में पानी का ठहराव बिल्कुल न होने दें और जरूरत पड़ने पर ही सिंचाई करें।
  • घबराकर यूरिया की अधिक मात्रा का प्रयोग न करें, क्योंकि यह पौधे के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
  • फसल की शुरुआत से ही रोग-प्रतिरोधी बीजों का चुनाव करें और बुवाई से पहले बीजोपचार जरूर करें।
  • नियमित रूप से अपने खेतों की निगरानी करते रहें ताकि लक्षण दिखते ही तत्काल उपचार किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सतर्कता और सही समय पर दवाओं का प्रयोग ही इस चुनौती से पार पाने का एकमात्र रास्ता है, जिससे फसल को बचाया जा सके और पैदावार को सुरक्षित रखा जा सके।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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