जीवनशैली
एक घंटा पहले
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झारखंड अपनी प्राकृतिक संपदा, घने जंगलों और पारंपरिक खानपान के कारण पूरे देश में अलग पहचान रखता है। यहां के जंगलों में कई ऐसे फल और वन उपज पाई जाती हैं, जिनसे शहरों में रहने वाले लोग अक्सर अनजान रहते हैं। ऐसा ही एक फल है कुसुम, जो गर्मियों के मौसम में जंगलों और गांवों के इलाकों में बड़ी मात्रा में दिखाई देता है। स्वाद और पोषण से भरपूर यह फल ग्रामीण जीवन और परंपरागत भोजन का अहम हिस्सा माना जाता है।
पेड़ से तोड़कर ताजा कुसुम खाने का अलग आनंद
कुसुम का फल अपने निराले स्वाद के लिए जाना जाता है। इसमें खट्टापन, मिठास और हल्का तीखापन एक साथ महसूस होता है। यही वजह है कि इसे खाने के बाद इसका स्वाद काफी देर तक जुबान पर बना रहता है। गांवों में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई इस फल का बेसब्री से इंतजार करता है। गर्मी के दिनों में पेड़ से ताजा कुसुम तोड़कर खाने का मजा ही कुछ और होता है।
खट्टा, तीखा और चटपटा स्वाद एक साथ
कुसुम का सबसे लोकप्रिय इस्तेमाल इसकी खास चटनी तैयार करने में होता है। ग्रामीण महिलाएं सबसे पहले फलों को साफ पानी से अच्छी तरह धोती हैं। इसके बाद फल की ऊपरी परत हटाकर उसका गूदा अलग किया जाता है। फिर इस गूदे को किसी बोतल या बर्तन में डालकर उसमें स्वादानुसार नमक, चीनी और मिर्च मिलाई जाती है। इसके बाद बर्तन को अच्छी तरह बंद कर हिलाया जाता है, जिससे बीज और गूदा एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं।
तैयार चटनी का स्वाद इतना अनोखा होता है कि इसमें खट्टा, मीठा, तीखा और चटपटा स्वाद एक साथ मिलता है। एक बार खाने के बाद इसे बार-बार खाने का मन करता है।
बीजों से निकाला जाता है तेल
कुसुम की उपयोगिता केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। ग्रामीण समुदाय इसके बीजों का भी इस्तेमाल करता है। फल के बीजों को सुखाकर उनसे तेल निकाला जाता है। यह तेल परंपरागत रूप से शरीर की मालिश, त्वचा की देखभाल और दूसरे घरेलू कामों में उपयोग किया जाता है। ग्रामीण मान्यता के मुताबिक कुसुम के बीज का तेल कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है और त्वचा को मुलायम बनाए रखने में मददगार माना जाता है।
वन विशेषज्ञों के अनुसार कुसुम का पेड़ पर्यावरण के लिहाज से भी अहम है। यह जंगलों की जैव विविधता को बनाए रखने में सहायक होता है और कई पक्षियों तथा जीव-जंतुओं के लिए भोजन का स्रोत बनता है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में कुसुम के पेड़ों को विशेष महत्व दिया जाता है।
झारखंड की परंपरा की पहचान
आधुनिक खानपान के इस दौर में भले ही लोग पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हों, लेकिन कुसुम जैसे पारंपरिक वन फल आज भी झारखंड की संस्कृति और स्वाद की पहचान बने हुए हैं। इसकी चटनी और बीजों से बनने वाला तेल न सिर्फ स्थानीय परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि प्रकृति और ग्रामीण जीवन के गहरे रिश्ते को भी दर्शाते हैं।
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