रांची में मिला अनोखा डीजल देने वाला पेड़, ग्रामीणों के लिए किसी खजाने से कम नहीं झारखंड 2 महीने पहले 73
रांची के इटकी गांव में एक विशेष पेड़ पाया जाता है जिसके बीज से डीजल और प्राकृतिक औषधियां बनाई जाती हैं। ग्रामीण इसे एक बहुउद्देशीय रामबाण औषधि मानकर इस्तेमाल करते हैं।

रांची के इटकी गांव में है कुदरत का करिश्मा

झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित इटकी गांव इन दिनों एक खास तरह के पेड़ के कारण चर्चा में है। यहां के ग्रामीण इस पेड़ को डीजल पेड़ के नाम से जानते हैं। यह पौधा न केवल पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य के लिहाज से भी एक वरदान साबित हो रहा है। स्थानीय लोग इस पेड़ की विभिन्न विशेषताओं का उपयोग करके अपनी दैनिक जरूरतें पूरी कर रहे हैं।

बीज से निकलता है डीजल

इस पेड़ की सबसे बड़ी खासियत इसके बीज हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, इन बीजों के भीतर से विशेष प्रकार का तेल प्राप्त होता है, जिसका उपयोग डीजल के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। एक शोध और जानकारी के मुताबिक, इस बीज में लगभग 42% से 50% तक तेल की मात्रा होती है, जो ऊर्जा के स्रोत के रूप में काम आ सकता है। हालांकि सरकारी स्तर पर इसके बड़े पैमाने पर रोपण के लिए पहल की गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से वह योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। फिर भी, ग्रामीणों के लिए यह आज भी एक उपयोगी संसाधन बना हुआ है। यदि आप इसके बीज को हाथ में लेकर रगड़ें, तो आप स्पष्ट रूप से इसमें से डीजल जैसी विशिष्ट गंध महसूस कर सकते हैं।

जैविक खेती के लिए रामबाण

इटकी के ग्रामीण इस पेड़ का सबसे अधिक उपयोग जैविक कीटनाशक बनाने में करते हैं। स्थानीय निवासी सरिता बताती हैं कि वे इस पेड़ की पत्तियों और बीजों को इकट्ठा करती हैं। इसके बाद इसे जामुन के सिरके और गुड़ जैसे प्राकृतिक तत्वों के साथ मिलाकर एक असरदार देसी दवा तैयार की जाती है। यह दवा खेतों में कीड़ों को नियंत्रित करने का काम करती है। यह विधि पूरी तरह से जैविक है, जिससे मिट्टी और फसल दोनों सुरक्षित रहते हैं।

दर्द और सूजन से मिलती है राहत

इस पेड़ के औषधीय गुणों का दायरा केवल खेती तक सीमित नहीं है। ग्रामीण इसे प्राकृतिक पेन किलर के रूप में भी देखते हैं। अगर किसी व्यक्ति को चोट लगी हो या शरीर के किसी हिस्से में पुरानी सूजन और दर्द की समस्या हो, तो इस बीज का लेप या तेल बहुत कारगर साबित होता है। इसे प्रभावित जगह पर रगड़ने से दर्द में तुरंत राहत मिलती है। यही कारण है कि ग्रामीण इसे अपने घरेलू उपचार के लिए बहुत कीमती मानते हैं।

क्यों है यह गांव वालों के लिए खजाना?

गांव के निवासी कुलदीप का कहना है कि यह पेड़ किसी औषधि से कम नहीं है। विशेष रूप से जैविक खेती के लिए लोग इन बीजों की खोज में रहते हैं। अक्सर इन बीजों की मांग इतनी ज्यादा होती है कि ये आसानी से उपलब्ध भी नहीं हो पाते हैं। ग्रामीण इस पेड़ के पत्ते से लेकर बीज तक, हर हिस्से का उपयोग करना जानते हैं। यह पेड़ न केवल ग्रामीणों की आर्थिक बचत करता है, बल्कि उन्हें हानिकारक रसायनों से दूर रहकर प्राकृतिक जीवन जीने में भी मदद कर रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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