झीरम घाटी नक्सली हमला: तीन महीने पहले ही तैयार हो गया था खूनी खाका, महेंद्र कर्मा को ढूंढकर मारी गई थी गोली छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 2
छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी नक्सली हमले की जांच में खुलासा हुआ है कि माओवादियों ने इस जघन्य वारदात की पटकथा तीन महीने पहले ही लिख दी थी। एनआईए की जांच से पता चला है कि हमलावर रिहर्सल करने के बाद पूरी तैयारी के साथ आए थे और महेंद्र कर्मा को निशाना बनाने के लिए उन्होंने विशेष साजिश रची थी।

झीरम घाटी हमले का गहरा षड्यंत्र

छत्तीसगढ़ के इतिहास में झीरम घाटी का नक्सली हमला एक ऐसा काला अध्याय है, जिसे राज्य कभी नहीं भूल सकता। इस हमले के दोषियों को कानूनी सजा मिल चुकी है, लेकिन अब जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। एनआईए की हालिया रिपोर्ट और अदालत के आदेशों से यह पुष्टि हुई है कि माओवादियों ने 25 मई 2013 को हुए इस बड़े हमले की योजना तीन महीने पहले ही बना ली थी। नक्सलियों ने न केवल हमले की जगह चुनी थी, बल्कि घटना को अंजाम देने से पहले बाकायदा रिहर्सल भी की थी। हमले के दौरान जिस तरह से महेंद्र कर्मा को ढूंढकर उनके बहुत करीब से गोलियां मारी गईं, वह नक्सलियों की क्रूरता की पराकाष्ठा थी।

साजिश का तीन महीने पुराना ताना-बाना

एनआईए कोर्ट द्वारा सभी 10 दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा के बाद जांच की परतें खुलती गईं। जांच के अनुसार, माओवादियों ने 16 से 25 फरवरी, 2013 के बीच अपनी 'साउथ रीजनल यूनिफाइड कमांड' की बैठक के दौरान इस हमले की पटकथा तैयार कर ली थी। इस मिशन को सफल बनाने के लिए उन्होंने अलग-अलग सैन्य इकाइयों और स्थानीय नक्सलियों को मिलाकर एक विशेष दल का गठन किया था। उन्होंने सुकमा-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का बारीकी से सर्वे किया और हमले के लिए झीरम घाटी को सबसे सुरक्षित और घातक जगह के रूप में चुना।

दोषी करार दिए गए माओवादी

अदालत ने जिन 10 लोगों को इस हमले में दोषी ठहराया है, उनमें प्रमिला मोड़ियाम (25), चैतू लेकाम (25), सुमित्रा पुनेम उर्फ आयती मोड़ियाम (40), मुक्का मंडावी (40), कवासी कोसा (30), आयता मड़काम (35), मडकामी देवा (35), जोगा मडकामी (35), बंजामी सन्ना (35) और महादेव नाग (28) शामिल हैं। इसके अलावा 27 आरोपी अभी भी फरार हैं, जिनमें थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी और बरसे सुक्का उर्फ देवा जैसे बड़े नाम शामिल हैं, जिन्होंने बाद में तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया था। अदालत के अनुसार, दरभा डिविजनल कमेटी के सदस्य बरसे सुक्का को इस ऑपरेशन का मुख्य मास्टरमाइंड बनाया गया था।

कांग्रेस नेतृत्व का सफाया

25 मई, 2013 को कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' पर हुए इस हमले ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की पूरी पीढ़ी को खत्म कर दिया था। इस हमले में कुल 27 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। मरने वालों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, विधानसभा में विपक्ष के नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार जैसे कद्दावर नेता शामिल थे। गाड़ियों पर गोलियों के 206 निशान यह बताने के लिए काफी थे कि यह हमला किसी सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया था।

रिहर्सल और रसद का बंदोबस्त

अदालत ने स्पष्ट कहा है कि यह घटना अचानक नहीं हुई थी, बल्कि पूर्व नियोजित थी। हमले से छह-सात दिन पहले एक्कम-चकपाल के पास घने जंगल में नक्सलियों ने रिहर्सल की थी। हमले की तैयारी के लिए रसद का भी पूरा प्रबंध था। कांगेर घाटी क्षेत्रीय समिति के सदस्यों ने जन मिलिशिया और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर बड़ी तादाद में खाने-पीने और रहने का सामान जुटाया था। कोलेंग गांव से चावल की करीब 25 बोरियां (हर एक का वजन 50 किलो) एकत्रित की गई थीं, जिन्हें महादेव नाग के घर पर रखा गया था। 23 मई तक यह सारा सामान माओवादी कैडरों को सौंप दिया गया था और ग्रामीणों को खाना पकाने एवं जलावन के लिए रोक लिया गया था।

महेंद्र कर्मा के साथ दरिंदगी

गवाहों के बयानों और साक्ष्यों से पता चलता है कि नक्सली खास तौर पर सलवा जुडूम के नेता महेंद्र कर्मा को ढूंढ रहे थे। कर्मा ने अपनी पहचान बताने के बाद हमलावरों से निर्दोष लोगों को न मारने की गुहार लगाई थी, लेकिन नक्सलियों ने उनकी एक न सुनी। उन्हें खींचकर पहाड़ी पर ले जाया गया और बेहद करीब से गोलियां मारी गईं। उनके सिर पर पत्थर भी मारे गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उनके शरीर पर कम से कम 69 घाव पाए गए थे। इतना ही नहीं, उनकी मौत के बाद नक्सली उनकी लाश के पास नाचते रहे और चाकू से चोटें पहुँचाते रहे। यह बर्बरता इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' की श्रेणी में खड़ा करती है।

गोलीबारी और कवासी लखमा का प्रसंग

हमले के समय नक्सलियों के पास एके-सीरीज की राइफलें, एसएलआर, एलएमजी और हथगोले जैसे आधुनिक हथियार मौजूद थे। शाम करीब 4 बजे, जब काफिला झीरम घाटी से 13 किमी दूर था, तब ब्लास्ट कर काफिले को रोका गया और 150-200 नक्सलियों ने दोनों तरफ से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। जांच में यह भी सामने आया है कि हमले के दौरान नक्सलियों ने भारी मात्रा में हथियार भी लूटे थे। घटना के बाद नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश और कवासी लखमा को नक्सली जंगल में ले गए थे। लखमा और नक्सलियों के बीच गोंडी भाषा में हुई बातचीत भी जांच का विषय रही है। लखमा के फोन पर बार-बार आने वाली कॉल्स और गोंडी में ‘डीजल-डीजल’ का जिक्र भी गवाहों ने किया है। बाद में पटेल और उनके बेटे की हत्या कर दी गई, जबकि लखमा वहां से निकलने में सफल रहे।

जांच का दायरा

यह मामला शुरू में दरभा पुलिस थाने में दर्ज किया गया था, लेकिन दो दिन के भीतर ही इसे एनआईए को सौंप दिया गया। एनआईए ने यूएपीए, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत अपनी जांच पूरी की, जिसने नक्सलियों के इस भयावह चेहरे और उनकी सूक्ष्म योजनाबद्ध कार्यप्रणाली को दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया। आज भी झीरम घाटी का यह नाम किसी खौफ से कम नहीं है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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