बारिश कम हुई तो किसान क्या उगाएं? वैज्ञानिक ने सुझाईं 90 दिन में पकने वाली फसलें बिहार एक घंटा पहले 5
कम बारिश की आशंका को देखते हुए कृषि वैज्ञानिक किसानों को लंबी अवधि वाली धान की जगह कम समय में तैयार होने वाली सोयाबीन और अरहर जैसी फसलें अपनाने की सलाह दे रहे हैं।

बिहार के सीतामढ़ी और आसपास के इलाकों में इस बार खरीफ सीजन के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, शिवहर की प्रधान वैज्ञानिक अनुराधा रंजन ने किसानों को खेती की रणनीति में बदलाव करने की सलाह दी है। उनका मानना है कि इस बार किसानों को लंबी अवधि वाली पारंपरिक धान की किस्मों की जगह कम समय में तैयार होने वाली किस्मों को चुनना चाहिए।

धान की खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर करती है, इसलिए वर्षा की कमी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में समय रहते फसल के चुनाव में बदलाव करना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

कम पानी में बेहतर पैदावार देती है सोयाबीन

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक जिन इलाकों में सिंचाई के साधन सीमित हैं या जहां ऊपरी और मध्यम ढलान वाली जमीन है, वहां सोयाबीन की खेती एक बेहतर विकल्प हो सकती है। सोयाबीन एक प्रमुख तिलहन फसल है और इसकी खेती लगभग 120 दिनों में तैयार हो जाती है।

आधुनिक कृषि तकनीकों के विकास के साथ अब 110 दिनों और यहां तक कि 90 दिनों में तैयार होने वाली उन्नत किस्में भी किसानों के लिए उपलब्ध हैं। इन कम अवधि वाली किस्मों की खेती से किसान सूखे या कम बारिश की स्थिति में भी अपनी लागत सुरक्षित रख सकते हैं। साथ ही कम समय में फसल तैयार होने से उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी बनी रहती है।

सोयाबीन के लिए मुफीद है शिवहर की मिट्टी

प्रधान वैज्ञानिक अनुराधा रंजन के अनुसार शिवहर जिले की भौगोलिक स्थिति और यहां की मिट्टी सोयाबीन की खेती के लिए काफी उपयुक्त है। इस फसल के लिए हल्की बलुई मिट्टी और ऐसी जमीन बेहतर मानी जाती है, जहां जलजमाव की समस्या न हो।

जिले में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जमीन अपेक्षाकृत ऊंची है और मिट्टी में बालू की मात्रा मौजूद है। इन इलाकों के किसान आसानी से सोयाबीन उगा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी मिट्टी में सोयाबीन की जड़ों का विकास बेहतर होता है, जिससे पौधों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ती हैं।

अरहर की खेती भी बन सकती है मुनाफे का सौदा

तिलहन फसलों के अलावा दलहन फसलों में भी किसानों के लिए बेहतर संभावनाएं मौजूद हैं। कम बारिश की स्थिति को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने अरहर यानी पीजन पी की खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी है। अरहर एक ऐसी मजबूत फसल है, जो कम पानी और ऊंचे तापमान को आसानी से सहन कर सकती है।

खरीफ सीजन में धान के विकल्प के तौर पर अरहर की खेती कर किसान बाजार में अच्छी कीमत का लाभ भी उठा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम और कम वर्षा की स्थिति में सोयाबीन और अरहर जैसी वैकल्पिक फसलें ज्यादा बेहतर हैं। ये फसलें किसानों के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकती हैं और उनकी आय को स्थिर बनाए रखने में मददगार साबित हो सकती हैं।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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