कभी ठेले पर बांस का सामान बेचते थे, अब 3 करोड़ का कारोबार—पूर्णिया के मां-बेटे की अनूठी दास्तां बिहार एक महीने पहले 17
पूर्णिया की आशा अनुरागिनी और उनके बेटे सत्यम सुंदरम ने महज 15 हजार रुपये से बांस के पर्यावरण अनुकूल उत्पादों का कारोबार शुरू किया और आज उनका सालाना टर्नओवर करीब 3 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

कहा जाता है कि अगर हौसला बुलंद हो और कुछ कर दिखाने की ठान ली जाए तो सफलता कदम जरूर चूमती है। बिहार के पूर्णिया जिले की एक मां-बेटे की जोड़ी ने इस बात को हकीकत में बदलकर दिखा दिया है। कभी गली-मोहल्लों में घूम-घूमकर बांस से बने सामान बेचने वाली आशा अनुरागिनी और उनके बेटे सत्यम सुंदरम आज अपने उत्पाद देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचा रहे हैं।

पर्यावरण की सोच से शुरू हुआ सफर

पूर्णिया के मरंगा स्थित सत्संग विहार वार्ड संख्या-9 में रहने वाली आशा अनुरागिनी और उनके बेटे सत्यम सुंदरम ने पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखते हुए बांस से बने उत्पादों का व्यवसाय शुरू किया। उनकी मंशा ऐसा कारोबार खड़ा करने की थी, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान न हो और साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल सके। इसी सोच के साथ उन्होंने बम्बू फैक्ट्री की नींव रखी।

सड़क के स्टॉल से मिली पहचान

मां-बेटे बताते हैं कि कारोबार के शुरुआती दौर में वे खुद बांस से बने उत्पाद लेकर शहर की गलियों, मोहल्लों और सड़कों पर स्टॉल लगाकर बिक्री करते थे। वे लोगों को इन उत्पादों के फायदे समझाते और खरीदने के लिए प्रेरित करते थे। समय के साथ लोगों का भरोसा बढ़ता गया और उनके उत्पादों की मांग भी तेज होती चली गई।

उनकी मेहनत का फल मिला और बिहार सरकार की उद्यमी योजना के तहत उन्हें ऋण मिल गया, जिसके बाद उन्होंने अपने कारोबार को और आगे बढ़ाया। आज उनके बांस से बने उत्पादों के स्टॉल पूर्णिया समेत कई रेलवे स्टेशनों और दूसरी जगहों पर लगते हैं, जहां रोजाना अच्छी-खासी बिक्री होती है।

विदेशों तक पहुंचा पूर्णिया का बांस

खास बात यह है कि पूर्णिया में तैयार होने वाले ये बांस के उत्पाद अब भारत के कई राज्यों के साथ-साथ सिंगापुर, जापान और न्यूजीलैंड समेत दूसरे देशों में भी भेजे जा रहे हैं। इससे पूर्णिया के स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल हो रही है।

उनकी फैक्ट्री में कई उपयोगी और आकर्षक चीजें बनाई जाती हैं। इनमें बांस की पानी की बोतल, टूथब्रश, पेन स्टैंड, फोटो फ्रेम, नेम प्लेट, की-रिंग, टेबल, कुर्सी, सोफा और तरह-तरह का सजावटी सामान शामिल है। बाजार में इन उत्पादों की मांग लगातार बनी रहती है।

प्लास्टिक का बेहतर विकल्प

सत्यम सुंदरम का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। प्लास्टिक की जगह बांस से बने उत्पादों के इस्तेमाल से प्रकृति को कोई हानि नहीं पहुंचती। उन्होंने बताया कि बांस की बोतल में पानी पीने का अनुभव भी अलग और बेहतर होता है, यही वजह है कि लोगों के बीच इन उत्पादों की मांग दिन-ब-दिन बढ़ रही है।

15 हजार से 3 करोड़ तक का सफर

मां-बेटे की इस मेहनत ने आज पूर्णिया को एक नई पहचान दिलाई है। उन्होंने महज 15 हजार रुपये की पूंजी से इस कारोबार की शुरुआत की थी। आज उनकी कंपनी कई लोगों को रोजगार दे रही है और सालाना टर्नओवर करीब 3 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। उनकी यह कामयाबी आज तमाम युवाओं और उद्यमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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