पाकिस्तान के कचरे के ढेर में मिला अनोखा फंगस, क्या प्लास्टिक प्रदूषण से मिलेगी बड़ी राहत? विश्व 2 घंटे पहले 4
इस्लामाबाद में कचरे के एक डंपिंग ग्राउंड की मिट्टी से वैज्ञानिकों को एक खास तरह का कवक मिला है, जो खतरनाक प्लास्टिक को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह खोज प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की वैश्विक चुनौतियों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरी है।

कचरे के बीच से निकली बड़ी वैज्ञानिक उम्मीद

दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण एक ऐसी समस्या बन चुका है जिससे पार पाना वैज्ञानिकों और सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसी बीच, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से एक ऐसी खबर आई है जिसने शोधकर्ताओं को उत्साहित कर दिया है। इस्लामाबाद के एक म्यूनिसिपल कचरा डंपिंग ग्राउंड की मिट्टी में वैज्ञानिकों को एक खास तरह का फंगस मिला है, जो प्लास्टिक को नष्ट करने में सक्षम है। इस कवक को वैज्ञानिक भाषा में Aspergillus tubingensis के नाम से जाना जाता है। आम तौर पर इसे देख पाना मुश्किल है, लेकिन इसकी प्लास्टिक को पचाने की क्षमता ने इसे चर्चा का विषय बना दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सूक्ष्मजीव भविष्य में दुनिया को प्लास्टिक के बढ़ते अंबार से मुक्ति दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

क्या है इस फंगस की खासियत?

वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह फंगस पॉलिएस्टर पॉलीयूरेथेन जैसे बेहद सख्त और मजबूत प्लास्टिक को भी आसानी से तोड़ सकता है। पॉलीयूरेथेन कोई मामूली सामग्री नहीं है; इसका व्यापक इस्तेमाल सिंथेटिक लेदर, औद्योगिक कोटिंग, इंसुलेशन सामग्री और आरामदायक कुशन बनाने में किया जाता है। इसकी मजबूती ही इसे टिकाऊ बनाती है, लेकिन यही गुण इसे पर्यावरण के लिए सबसे हानिकारक बनाता है, क्योंकि इसे प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में दशकों लग जाते हैं। प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान, शोधकर्ताओं ने देखा कि यह फंगस सबसे पहले पॉलीयूरेथेन की सतह पर अपनी पकड़ मजबूत करता है और फिर उस पर हमला शुरू कर देता है।

प्रयोगशाला में सामने आए चौंकाने वाले परिणाम

जब शोधकर्ताओं ने इस फंगस को प्रयोगशाला में पॉलीयूरेथेन फिल्म के संपर्क में रखा, तो इसके नतीजे हैरान करने वाले थे। सूक्ष्मदर्शी यंत्रों (माइक्रोस्कोप) की मदद से की गई जांच में यह देखा गया कि प्लास्टिक की सतह पर खरोंच, दरारें और सूक्ष्म छिद्र बनने लगे थे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि फंगस केवल प्लास्टिक पर पनप नहीं रहा है, बल्कि उसकी जटिल रासायनिक संरचना को भीतर से कमजोर कर रहा है। करीब दो महीने तक चले इस नियंत्रित प्रयोग में प्लास्टिक फिल्म पूरी तरह से छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गई। वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को समझने के लिए उन्नत स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और एटीआर-एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। इन परीक्षणों से पता चला कि फंगस द्वारा छोड़े गए एंजाइम, जैसे कि एस्टरेज और लाइपेज, प्लास्टिक के पॉलिमर बंधनों को तोड़ने का काम कर रहे थे।

क्या यह प्लास्टिक का अंतिम समाधान है?

हालाँकि यह खोज बेहद उत्साहजनक है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी। प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में प्लास्टिक का टूटना एक बात है, लेकिन वास्तविक दुनिया में बड़े पैमाने पर कचरे के ढेर को खत्म करना पूरी तरह से अलग चुनौती है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह फंगस प्राकृतिक वातावरण में उतने ही प्रभावी ढंग से काम करेगा। इसके अलावा, प्लास्टिक का छोटे टुकड़ों में टूट जाना ही काफी नहीं है; यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि जो पदार्थ पीछे बच रहे हैं, वे पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित हों। फिर भी, यह खोज एक बहुत ही महत्वपूर्ण द्वार खोलती है, क्योंकि अब तक दुनिया प्लास्टिक निस्तारण के लिए केवल मैकेनिकल रिसाइक्लिंग और रासायनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर रही है।

भविष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

इस फंगस की खोज इसलिए खास है क्योंकि इसने प्लास्टिक के जैविक उपचार (बायोलॉजिकल डिग्रेडेशन) की संभावनाओं को नई दिशा दी है। वैज्ञानिक अब इस बात का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं कि इस फंगस के अंदर पाए जाने वाले कौन से एंजाइम इस प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। यदि इन विशिष्ट एंजाइमों को अलग करके उनका बड़े पैमाने पर औद्योगिक स्तर पर उपयोग करना संभव हो गया, तो प्लास्टिक कचरे के निस्तारण का एक पूरी तरह से नया और जैविक तरीका दुनिया के सामने आ सकता है। यह तकनीक उन प्लास्टिक उत्पादों के लिए विशेष रूप से मददगार साबित हो सकती है, जिन्हें पारंपरिक तरीकों से रिसाइकिल करना बहुत कठिन या असंभव माना जाता है।

कचरे के ढेर में छिपा विज्ञान

इस पूरी खोज का सबसे रोचक पहलू यह है कि यह फंगस किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला या किसी दुर्लभ स्थान से नहीं, बल्कि इस्लामाबाद के एक साधारण कचरा डंपिंग ग्राउंड से मिला है। अक्सर जिस जगह को प्रदूषण और गंदगी का प्रतीक माना जाता है, उसी जगह से प्रकृति ने समाधान की कुंजी प्रदान की है। 2017 में प्रकाशित हुए शोध कार्यों में पहली बार इस फंगस की क्षमता को उजागर किया गया था। अब वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने मुख्य चुनौती यह है कि प्रकृति में मौजूद इन सूक्ष्मजीवों की अद्भुत क्षमताओं को लैब से निकालकर वास्तविक जीवन और औद्योगिक अनुप्रयोगों में कैसे परिवर्तित किया जाए। यदि भविष्य में इसमें सफलता मिलती है, तो यह छोटा सा फंगस पर्यावरण संरक्षण के लिए एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप