रासायनिक उर्वरकों से पाएं छुटकारा, बेहद कम खर्च में तैयार करें दशपर्णी अर्क, बढ़ेगी फसल की पैदावार छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 4
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान अब प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर दशपर्णी अर्क का उपयोग फसलों को कीड़ों से बचाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रभावी साबित हो रहा है।

जैविक खेती की दिशा में एक नया कदम

आज के दौर में किसान रसायनों पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए प्राकृतिक विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक ऐसी ही क्रांति देखने को मिल रही है, जहां किसान फसलों के संरक्षण के लिए दशपर्णी अर्क का उपयोग कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञ डॉ. संदीप शर्मा का मानना है कि बेहद कम लागत में तैयार होने वाला यह अर्क खेती के लिए वरदान साबित हो सकता है। यह विशेष रूप से उन फसलों के लिए असरदार है जिन्हें रस चूसक कीटों और इल्लियों से बचाना एक बड़ी चुनौती होती है।

कैसे तैयार करें दशपर्णी अर्क

दशपर्णी अर्क की सबसे बड़ी खूबी इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री है। इसमें मुख्य रूप से उन दस प्रकार की पेड़-पौधों की पत्तियों का उपयोग किया जाता है, जिनमें प्राकृतिक रूप से कड़वाहट और औषधीय गुण होते हैं। डॉ. संदीप शर्मा के अनुसार, इन पत्तियों में करंज, बेल, बेशरम, हल्दी और पपीता जैसे पौधे शामिल हैं।

इसे बनाने की प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • सबसे पहले 200 लीटर क्षमता वाला एक प्लास्टिक का ड्रम लें।
  • इसमें 200 लीटर पानी भरें और साथ में 10 लीटर गोमूत्र तथा 1 से 2 किलो गोबर की खाद मिलाएं।
  • अब इसमें चयनित 10 तरह की कड़वी पत्तियां, मिर्च, हल्दी पाउडर, हींग और तंबाकू की पत्तियों का मिश्रण डालें।
  • इस पूरे मिश्रण को हर रोज एक निश्चित समय पर घड़ी की सुई की दिशा में अच्छी तरह मिलाएं।
  • लगभग 40 दिन तक इस प्रक्रिया को दोहराने के बाद यह मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है।

उपयोग की सही विधि और लाभ

जब 40 दिन की अवधि पूरी हो जाए, तो इस तैयार घोल को किसी सूती कपड़े या बारीक छन्नी से अच्छी तरह छान लें। जो तरल पदार्थ प्राप्त होगा, वही असली दशपर्णी अर्क है। डॉ. शर्मा बताते हैं कि छिड़काव के लिए मानक मात्रा का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। 5 से 6 लीटर दशपर्णी अर्क को 250 लीटर पानी में मिलाकर इसे एक हेक्टेयर क्षेत्र की फसलों पर छिड़का जा सकता है।

इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह अरहर, उड़द और मूंग जैसी प्रमुख फसलों में इल्लियों और रस चूसने वाले कीटों के नियंत्रण में बेहद कारगर है। किसान इसे अपनाकर न केवल बाजार में मिलने वाले महंगे कीटनाशकों का खर्च बचा सकते हैं, बल्कि अपनी फसल की गुणवत्ता और पैदावार में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। यह जैविक खेती का एक सरल और सस्ता समाधान है जो मिट्टी की उर्वरता को भी बनाए रखने में मदद करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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