गरीब सोमालिया में पाकिस्तान की 'चाल', सऊदी अरब के मोहरे के तौर पर क्यों सक्रिय हुआ इस्लामाबाद? विश्व एक घंटा पहले 6
पाकिस्तान ने हाल ही में सोमालिया के साथ एक रक्षा समझौता किया है, जिसे हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सऊदी अरब के बढ़ते प्रभाव और रणनीतिक बिसात का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान यहां अपनी सैन्य साख बचाने और सऊदी अरब को खुश करने के लिए एक भाड़े के सैनिक की भूमिका निभा रहा है।

पाकिस्तान और सोमालिया की नई रक्षा डील

हाल ही में पाकिस्तान ने दुनिया के सबसे गरीब और लंबे समय से संघर्षों से घिरे देशों में शुमार सोमालिया के साथ एक बड़ा रक्षा समझौता किया है। इस करार के महज तीन दिन बाद, पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर भी हस्ताक्षर कर दिए। सोमालिया का भौगोलिक स्थान रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लाल सागर और पश्चिमी हिंद महासागर के मुहाने पर स्थित हॉर्न ऑफ अफ्रीका में बसा है। पाकिस्तान का इस क्षेत्र में प्रवेश सिर्फ सैन्य सहायता या अपने पुराने JF-17 फाइटर जेट को बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक खेल चल रहा है जिसके केंद्र में सऊदी अरब की महत्वाकांक्षाएं हैं।

हॉर्न ऑफ अफ्रीका का रणनीतिक महत्व और सऊदी अरब की मंशा

हॉर्न ऑफ अफ्रीका केवल एक इलाका नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति का एक प्रमुख चौराहा है। खाड़ी देशों, लाल सागर और हिंद महासागर के समुद्री रास्तों के लिए यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। वर्तमान में, सऊदी अरब और तुर्की यहां अपनी रणनीतिक बढ़त बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इस दौड़ में उनका सीधा मुकाबला संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE के साथ है। सोमालिया के साथ पाकिस्तान का यह रक्षा समझौता स्थानीय समस्याओं को सुलझाने से अधिक, सऊदी अरब के निर्देशों पर इस जटिल बिसात पर अपनी गोटी सेट करने की कवायद नजर आता है। सऊदी अरब इस पूरे खेल में पाकिस्तान को एक फ्रंट-मैन के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ताकि वह बिना खुद को सीधे जोखिम में डाले अपना दबदबा कायम रख सके।

पाकिस्तान का पुराना इतिहास और वर्तमान परिस्थितियां

अगर हम 1990 के दशक पर नजर डालें, तो संयुक्त राष्ट्र के सोमालिया मिशन में पाकिस्तानी सेना ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। 1995 में जब अंतरराष्ट्रीय बल वहां से हट रहे थे, तब मोगादिशु छोड़ने वाले अंतिम सैन्य दलों में पाकिस्तानी सैनिक शामिल थे। हालांकि, उस पुराने इतिहास को आज की परिस्थितियों के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। पिछले दो दशकों से सोमालिया अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन अल-शबाब के खिलाफ एक भीषण युद्ध लड़ रहा है। इस लंबी लड़ाई में पाकिस्तान की कोई सीधी भागीदारी नहीं रही है। इसके विपरीत, युगांडा, बुरुंडी, केन्या, इथियोपिया और जिबूती जैसे अफ्रीकी देशों ने इस संघर्ष का भारी बोझ उठाया है, जबकि पाकिस्तान ने इस दौरान न तो बड़ी संख्या में सैनिक भेजे और न ही कोई ठोस आर्थिक योगदान दिया।

पाकिस्तान क्यों बना सोमालिया का नया 'मददगार'?

सवाल यह उठता है कि अचानक पाकिस्तान सोमालिया के प्रति इतना उदार क्यों हो गया है? वास्तव में, सोमालिया अपनी बिखरी हुई सेना को फिर से संगठित करने का प्रयास कर रहा है। पाकिस्तान उन्हें युद्ध का अनुभव रखने वाले सैन्य बल और आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए ट्रेनिंग देने का झांसा दे रहा है। रक्षा जगत में यह चर्चा जोरों पर है कि सोमालिया पाकिस्तान के JF-17 फाइटर जेट खरीदने में रुचि दिखा रहा है। ऐसी अटकलें भी हैं कि इन सौदों के पीछे सऊदी अरब और तुर्की की तिजोरी का सहारा है। हालांकि, जब तक आधिकारिक अनुबंध सामने नहीं आते, तब तक इन पर पूरी तरह यकीन करना कठिन है। एक बात तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान जोंक की तरह सोमालिया से चिपककर उसे हथियार बेचने के बहाने अपनी खाली जेबें भरने और सऊदी आकाओं की नजरों में अपनी सैन्य हैसियत को साबित करने की कोशिश में है।

सऊदी अरब और UAE की वर्चस्व की लड़ाई

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सऊदी अरब है। रियाद ने इस साल की शुरुआत में सोमालिया के साथ एक अलग सैन्य समझौता किया था। सऊदी अरब का मुख्य लक्ष्य सूडान और लाल सागर के पूरे क्षेत्र में अपना राजनीतिक और सैन्य प्रभाव फैलाना है। रियाद का ध्येय आतंकवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि बाब अल-मंदेब स्ट्रेट और अरब प्रायद्वीप के समुद्री रास्तों को सुरक्षित करना है, ताकि UAE के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी जा सके। इसी रणनीति के तहत मक्का रक्षा समझौते के माध्यम से सऊदी अरब ने तुर्की और पाकिस्तान जैसे दो अलग-अलग प्यादों को अपने पाले में शामिल किया है। जहां तुर्की अपने घातक ड्रोन और नौसेना के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, वहीं पाकिस्तान अपनी विशाल थलसेना और सऊदी कर्ज को चुकाने की मजबूरी के कारण उनका सैन्य औजार बनने को तैयार है।

पाकिस्तान की मजबूरियां और भविष्य का खतरा

पाकिस्तान के लिए यह अपनी आर्थिक लाचारी और भीखमंगे वाली छवि को बदलने का एक प्रयास मात्र है। सऊदी अरब अब केवल मुफ्त वित्तीय मदद देने के बजाय चाहता है कि पाकिस्तान उनके क्षेत्रीय सुरक्षा चक्र में एक सक्रिय सैनिक औजार के रूप में काम करे। पाकिस्तान अपनी सेना को सीधे बड़े युद्ध में झोंकने के बजाय ट्रेनिंग और तकनीकी सहायता के जरिए अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में जुटा है। हालांकि, सोमालिया के मामले में पाकिस्तान बहुत बड़े खतरे की ओर कदम बढ़ा रहा है। अपनी खुद की खराब आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के बीच, अगर पाकिस्तान सोमालिया के दलदल में अधिक गहराई से उतरता है, तो भविष्य में उसे सूडान या लीबिया जैसे अन्य संघर्षों में भी सऊदी अरब के इशारे पर लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। पाकिस्तान के पास न तो इतने संसाधन हैं और न ही इतनी क्षमता कि वह हर जगह सऊदी अरब का भाड़े का सैनिक बनकर खड़ा रह सके।

निष्कर्ष: क्या इस्लामाबाद अपनी साख बचा पाएगा?

हॉर्न ऑफ अफ्रीका का क्षेत्र पहले से ही सऊदी अरब, UAE, तुर्की, कतर, मिस्र, अमेरिका और चीन जैसी बड़ी ताकतों का अखाड़ा बन चुका है। पाकिस्तान के इस कदम को कोई स्वतंत्र विदेश नीति नहीं माना जा रहा है, बल्कि उसे सऊदी-तुर्की गुट के एक मामूली मोहरे की तरह देखा जा रहा है। सबसे बड़ा डर यह है कि पाकिस्तान लाल सागर और अफ्रीका के इस विवादित दलदल में फंसकर रह जाएगा, जहां से निकलना उसके लिए नामुमकिन होगा। पाकिस्तान के नीति निर्माता भी जानते हैं कि वह अल-शबाब जैसे आतंकियों से लड़ने के लिए अपने जवानों की कुर्बानी नहीं देने वाले। असल मकसद केवल अपनी गिरती साख को बचाना है। यह सोमालिया के बहाने खाड़ी और हिंद महासागर के क्षेत्र में खुद को एक जरूरी खिलाड़ी के रूप में पेश करने की एक नाकाम कोशिश के सिवा कुछ नहीं है। अंत में, पाकिस्तान इस खेल में अपनी कोई रणनीतिक ताकत हासिल नहीं कर पाएगा, बल्कि वह केवल सऊदी-तुर्की गठबंधन का एक और 'सैनिक औजार' बनकर रह जाएगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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