धरती का सबसे जोखिम भरा रेल मार्ग: जहां ट्रेन उल्टी होकर चढ़ती है पहाड़, निर्माण में गई 2000 जानें! विश्व एक महीने पहले 25
इक्वाडोर के एंडीज पर्वतों को काटकर बना 'डेविल्स नोज' रेलवे ट्रैक इंजीनियरिंग का अनोखा नमूना है, जिसे बनाने में चीफ इंजीनियर समेत 2,000 से ज्यादा मजदूरों की जान चली गई थी।

इंसान ने अपने हौसले और हुनर के बल पर कई बार ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो देखने में नामुमकिन लगते हैं। ऐसा ही एक करिश्मा करीब 125 साल पहले इक्वाडोर के दुर्गम एंडीज पर्वतों पर हुआ था। यहां एक रेल मार्ग तैयार किया गया, जिसे आज भी दुनिया का सबसे कठिन और जोखिम भरा रेलवे ट्रैक माना जाता है। इसका नाम है 'डेविल्स नोज', यानी शैतान की नाक। इस ट्रैक की दास्तान जितनी रोमांचक है, उतनी ही भयावह भी, क्योंकि इसे बनाने के लिए मजदूरों को प्रकृति के साथ-साथ उस डर से भी जूझना पड़ा, जिसे लोग शैतान का अभिशाप मानते थे।

राष्ट्रपति की जिद से शुरू हुआ सपना

यह बात साल 1895 की है। इक्वाडोर के राष्ट्रपति जनरल एलोय अल्फारो ने सत्ता संभालते ही एक बड़ा फैसला सुनाया। उन्होंने तटीय शहर गुआयाकिल को पहाड़ों पर बसी राजधानी क्विटो से रेल लाइन के जरिए जोड़ने की घोषणा की। इस ऐलान के बाद देश में उनका जमकर विरोध हुआ। नेताओं से लेकर आम लोगों तक, सभी का मानना था कि विशाल और ऊंचे एंडीज पहाड़ों को चीरकर ट्रेन चलाना पूरी तरह असंभव है।

लेकिन राष्ट्रपति अल्फारो अपने इरादे पर अड़े रहे। विरोध की परवाह किए बिना उन्होंने अमेरिका के कुछ बड़े ठेकेदारों को यह जिम्मेदारी सौंपी और उन्हें दुनिया का सबसे मुश्किल रेलवे ट्रैक बनाने का काम दिया। इसके बाद साल 1899 में इस ऐतिहासिक रेल लाइन का निर्माण आरंभ हुआ।

जहरीले सांप, जगुआर और जानलेवा बीमारियां

पहाड़ों पर यह रेल लाइन बिछाना आसान नहीं था। काम शुरू होते ही मजदूरों और इंजीनियरों को बार-बार आने वाले भूकंप के झटकों, मूसलाधार बारिश, घने जंगलों में घूमते खूंखार जगुआर और जहरीले सांपों का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं, मलेरिया और पीला बुखार (येलो फीवर) जैसी घातक बीमारियों ने काम की रफ्तार बेहद धीमी कर दी।

पूरे रास्ते का सबसे खतरनाक हिस्सा अलाउसी और सिबाम्बे के बीच खड़ी 800 मीटर ऊंची एक सीधी चट्टान थी, जिसे डेविल्स नोज कहा जाता था।

आगे-पीछे करते हुए चढ़ती है ट्रेन

इस सीधी खड़ी चट्टान पर ट्रेन चढ़ाने के लिए इंजीनियरों ने एक अनोखा 'जिग-जैग' (Switchback) तरीका अपनाया। ट्रेन को 3.5% की सीधी ढलान पर चढ़ाने के मकसद से ट्रैक को इस तरह काटा गया कि ट्रेन पहले आगे की ओर बढ़ती और फिर एक जगह रुक जाती। इसके बाद ट्रेन का गार्ड नीचे उतरकर ट्रैक का लीवर बदलता और ट्रेन रिवर्स होकर ऊपर की ओर चढ़ती। यही प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती और इसी तरह आगे-पीछे होते हुए ट्रेन इस जानलेवा चट्टान को पार कर जाती।

शैतान का अभिशाप और 2000 मजदूरों की मौत

उस दौर में स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा फैल गई थी कि इस पहाड़ी पर खुद शैतान का बसेरा है। लोग कहते थे कि शैतान नहीं चाहता कि उसके इलाके से कोई ट्रेन गुजरे, इसलिए यहां काम करने वाले को अपनी जान गंवानी पड़ेगी। यह डर सच होता नजर भी आया।

इस खतरनाक ट्रैक को पूरा करते-करते बीमारी, हादसों और खराब मौसम के चलते 2,000 से ज्यादा मजदूरों की जान चली गई। मरने वालों में जमैका से लाए गए मजदूर, आजादी के लालच में काम पर लगाए गए सैकड़ों कैदी और इस परियोजना के चीफ इंजीनियर मेजर जॉन हरमन भी शामिल थे।

अब पर्यटकों के रोमांच का केंद्र

इतनी मौतों और मुश्किलों के बावजूद साल 1902 में पहली बार ट्रेन ने डेविल्स नोज की चढ़ाई पूरी की, जो उस समय इंजीनियरिंग का बहुत बड़ा करिश्मा था। यह रेल मार्ग वर्षों तक चलता रहा, लेकिन साल 1997 में आए एल नीनो तूफान और भारी भूस्खलनों ने इस ट्रैक को बुरी तरह तबाह कर दिया, जिससे पूरी लाइन बंद हो गई।

हालांकि आज भी पर्यटकों के रोमांच के लिए अलाउसी से सिबाम्बे के बीच का 12 किलोमीटर का हिस्सा खुला रखा गया है। यहां दुनिया भर से लोग इस 'शैतान की नाक' वाले ट्रैक पर ट्रेन के सफर का आनंद लेने और खूबसूरत वादियों को निहारने पहुंचते हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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