"हर रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता": सहमति से बने संबंध और चरित्र पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी भारत 6 घंटे पहले 3
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी के चरित्र को आंकने का आधार नहीं हो सकते, और रिश्ते का शादी तक न पहुंचना अपने आप में धोखा या अपराध नहीं माना जा सकता।

नई दिल्ली: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सहमति और बदलते सामाजिक रिश्तों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो वयस्कों के बीच आपसी रजामंदी से बने शारीरिक संबंध किसी भी सूरत में उनके चरित्र को मापने का पैमाना नहीं बन सकते। अदालत ने यह भी जोर देकर कहा कि यदि कोई रिश्ता विवाह तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे अपने आप में धोखा या अपराध नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, "दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र को लेकर नकारात्मक राय नहीं बनाई जा सकती। देश का ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो बालिगों को अपनी मर्जी से रिश्ता रखने से रोकता हो।"

पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़ा था मामला

यह पूरा विवाद तेलंगाना के एक पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी गाजुला तिरुपति की भर्ती से संबंधित था। तिरुपति का चयन केवल इस वजह से रद्द कर दिया गया था कि एक दशक से भी पहले पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ उनके रिश्ते को लेकर एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। बाद में यह मामला आपसी समझौते के जरिए सुलझा लिया गया था। शीर्ष अदालत ने न सिर्फ अभ्यर्थी को राहत दी, बल्कि समाज, कानून और निजी आजादी से जुड़े एक बड़े सवाल का भी जवाब दिया।

पीठ ने टिप्पणी की, "हर रिश्ता शादी के मुकाम तक नहीं पहुंचता। इसलिए, केवल इस आधार पर कि रिश्ता शादी में नहीं बदला, यह मान लेना गलत होगा कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ धोखाधड़ी की है।"

अदालत ने रेखांकित किया कि सामाजिक हकीकतें अब बदल चुकी हैं और सरकारी विभागों तथा संस्थाओं को पुरानी, रूढ़िवादी सोच से बाहर आना होगा। न्यायाधीशों ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि यदि दो बालिग कुछ वर्षों तक किसी रिश्ते में रहते हैं, तो कानूनी रूप से यही माना जाएगा कि वह संबंध आपसी सहमति पर आधारित था। पीठ ने यह भी याद दिलाया कि शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों पर दर्ज आपराधिक मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार खारिज कर चुका है।

"उम्मीदवार के चरित्र पर सवाल उठाने का विभाग को हक नहीं"

अदालत ने नियोक्ता की इस धारणा पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि अगर मामला समझौते से समाप्त हुआ है तो इसका अर्थ अभ्यर्थी का दोषी होना है। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया, "नियोक्ता केवल तब उम्मीदवार को अयोग्य मान सकता था, जब इस बात के सबूत होते कि शिकायतकर्ता महिला को समझौते के लिए डराया-धमकाया गया था। इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था।"

पीठ ने आगे कहा, "महिला को रिश्ते में धोखा दिया गया था या नहीं, यह सिर्फ वही बता सकती थी। जनता या कोई विभाग खुद से यह अंदाजा नहीं लगा सकता। जब महिला ने केस आगे नहीं बढ़ाया और मामला खत्म कर दिया, तो विभाग को खुद से कयास लगाकर उम्मीदवार के चरित्र पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है।"

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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