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एक घंटा पहले
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तनाव के साये में दक्षिण चीन सागर
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्षों के बीच अब दक्षिण चीन सागर एक नए विवाद का केंद्र बन गया है। लाल सागर में हूतियों और सऊदी अरब के बीच जारी तनाव हो या काला सागर में रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग, वैश्विक हालात पहले ही काफी नाजुक हैं। इस बीच चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्य मौजूदगी को अचानक बढ़ा दिया है। चीनी सेना ने विवादित समुद्री इलाकों में न केवल अपने युद्धपोत उतारे हैं, बल्कि आकाश मार्ग से भी कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। चीन की इस आक्रामक कार्रवाई ने फिलीपींस की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
चीन और फिलीपींस के बीच टकराव की स्थिति
चीन ने खुले तौर पर इन क्षेत्रों में अपने विमानों और नौसैनिक बेड़ों को तैनात करके फिलीपींस को सीधी चुनौती दी है। चीनी सेना के इस कदम का असर साफ तौर पर फिलीपींस की सुरक्षा चिंताओं के रूप में देखा जा रहा है। चीन का दावा है कि ये गतिविधियां पूरी तरह से नियमित सैन्य गश्त का हिस्सा हैं। हालांकि, चीन ने सीधे तौर पर फिलीपींस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि वह बाहरी देशों के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य गश्त कर रहा है, जो क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बिगाड़ने का काम कर रही है। यह आधिकारिक बयान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सदर्न थिएटर कमांड की ओर से जारी किया गया है।
चीनी सेना की खुली चेतावनी
चीनी PLA के सदर्न थिएटर कमांड के प्रवक्ता और वरिष्ठ नौसेना अधिकारी कर्नल झाई शिचेन ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि फिलीपींस द्वारा विदेशी देशों की मदद से की जा रही तथाकथित संयुक्त गश्त का उद्देश्य दक्षिण चीन सागर में तनाव पैदा करना है। उन्होंने आगे कहा कि चीन की सेना अपनी समुद्री सीमाओं, क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की सुरक्षा के लिए हर समय सतर्क और तैयार है। चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना जारी रखेगा।
क्या है विवाद की जड़?
दक्षिण चीन सागर लंबे समय से एशिया का सबसे संवेदनशील और विवादित समुद्री क्षेत्र बना हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि चीन लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना अधिकार जताता है। हालांकि, चीन के इस दावे को फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान जैसे देश सिरे से नकारते रहे हैं। इन सभी देशों का इस समुद्री क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर अपना दावा है। साल 2016 में एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने चीन के इन व्यापक दावों को कानूनी रूप से आधारहीन करार दिया था। इसके बावजूद चीन ने उस फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया और आज भी वह अपने दावे पर मजबूती से कायम है। यही कारण है कि यह जलक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है।
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