मुजफ्फरपुर की शाही लीची का नया रूप, सुजनी कला के जरिए तैयार हुई ‘लीचीपुरम आर्ट’ बिहार 6 घंटे पहले 3
बिहार के मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची अब केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे सुजनी शॉल पर कलात्मक रूप से उकेरा जा रहा है। ‘लीचीपुरम सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान’ के तहत स्थानीय कलाकारों ने कला और रोजगार को जोड़ने की अनूठी पहल की है।

मुजफ्फरपुर की पहचान का नया सफर

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की शाही लीची पूरी दुनिया में अपने खास स्वाद और मिठास के लिए जानी जाती है। हालांकि, अब इस पहचान को एक नया आयाम मिल रहा है। लीची की महक और उसकी मिठास अब केवल बागों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पारंपरिक सुजनी कला के धागों के माध्यम से एक कलाकृति बन गई है। लीचीपुरम सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान के अंतर्गत कलाकार विनीता सिंह ने एक अनूठी ‘लीचीपुरम आर्ट’ को जन्म दिया है, जो मुजफ्फरपुर की संस्कृति और हस्तशिल्प का एक बेजोड़ मिश्रण है। इस पहल का मूल उद्देश्य स्थानीय फल को कला के साथ जोड़कर देश और दुनिया के सामने एक नई पहचान पेश करना है।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और पर्यावरण का संदेश

इस पूरी मुहिम के पीछे लीचीपुरम सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान के संस्थापक और पर्यावरणविद सुरेश गुप्ता की दूरदर्शी सोच है। उनका मानना है कि मुजफ्फरपुर की पहचान को सुरक्षित रखने के लिए लीची के साथ कलात्मक जुड़ाव बेहद आवश्यक है। अभियान का मुख्य मंत्र ‘लोकल प्राइड, ग्लोबल राइड’ है, जिसके जरिए वे मुजफ्फरपुर की विशेषताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाना चाहते हैं।

अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि क्षेत्र में लीची के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। इसके अलावा, इससे लीची पर आधारित स्थानीय रोजगार भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में लीची को केवल एक फल की श्रेणी से बाहर निकालकर उसे हस्तशिल्प और कला से जोड़ना एक बड़ी उपलब्धि है। इससे न केवल लीची के महत्व को बढ़ाया जा रहा है, बल्कि ऐसे कलात्मक उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं जो उपयोगिता और सुंदरता दोनों में खरे उतरते हैं।

विनीता सिंह की मेहनत और हुनर का रंग

इस कलात्मक सफर में सुधा हस्त उद्योग की संस्थापक विनीता सिंह एक महत्वपूर्ण नाम के रूप में उभरी हैं। विनीता सिंह ने अपने करियर का एक साहसी मोड़ चुना और बीपीएससी शिक्षक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद सरकारी नौकरी छोड़कर हस्तशिल्प को अपनी जीविका का जरिया बनाया। उन्होंने कोच्चि कला और कैंडल वर्क के बाद अब सुजनी कला के माध्यम से लीचीपुरम आर्ट को एक नई दिशा प्रदान की है।

उनके द्वारा तैयार की गई सुजनी शॉल में लीची की मिठास को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। यह शॉल केवल एक कपड़े का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह स्थानीय हुनरमंदों की प्रतिभा और मुजफ्फरपुर की मिट्टी की सुगंध का प्रमाण है। सुरेश गुप्ता के मुताबिक, जब कोई ग्राहक स्थानीय उत्पादों को खरीदता है, तो वह केवल सामान नहीं ले रहा होता, बल्कि वह किसी कलाकार की कला का सम्मान कर रहा होता है। इससे कलाकार के परिवार को रोजगार मिलता है और उनकी मेहनत को आर्थिक संबल प्राप्त होता है।

स्थानीय कला और रोजगार को बढ़ावा

लीचीपुरम अभियान के जरिए आम जनता से अपील की जा रही है कि वे अधिक से अधिक स्थानीय कलाओं और उत्पादों को अपनाएं। यह अभियान केवल एक कलात्मक प्रयास नहीं है, बल्कि मुजफ्फरपुर के सामाजिक और आर्थिक सुधार की एक कोशिश भी है। अभियान के समर्थकों का स्पष्ट संदेश है कि यदि हम अपनी जड़ों और स्थानीय कला को बचाएंगे, तो निश्चित रूप से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और समाज में एक मीठी मुस्कान फैलेगी। यह पहल आने वाले समय में मुजफ्फरपुर के कारीगरों को एक नई पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है, जिससे लीची का नाम देश की हर गली और दुनिया के हर कोने तक पहुंचेगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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