राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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चीन सीमा पर भारत की बड़ी तैयारी
अरुणाचल प्रदेश के सबसे दुर्गम और संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में भारतीय सेना की पकड़ को अभेद्य बनाने के लिए भारत ने एक बड़े रणनीतिक दांव की शुरुआत की है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ ने 'प्रोजेक्ट अरुणांक' के अंतर्गत एक महत्वकांक्षी योजना तैयार की है, जो आने वाले समय में एलएसी पर पूरे सुरक्षा समीकरण को बदल कर रख देगी। इस योजना के तहत कुरुंग कुमे जिले के हुरी से लेकर अपर सुबनसिरी जिले के ताकसिंग तक करीब 95.348 किलोमीटर लंबी एक ऑल-वेदर ग्रीनफील्ड सड़क का निर्माण किया जाएगा। यह सड़क न केवल कनेक्टिविटी को सुधारेगी, बल्कि चीन की किसी भी चालबाजी का जवाब देने के लिए भारतीय सेना की क्षमताओं को कई गुना बढ़ा देगी।
प्रोजेक्ट अरुणांक की पूरी योजना
बीआरओ की ओर से तैयार की गई इस हाई-प्रायोरिटी रोड के लिए अब फीजिबिलिटी स्टडी और डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। दस्तावेजों के मुताबिक, यह नया ग्रीनफील्ड अलाइनमेंट एनएचडीएल के मानकों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है। इस सड़क की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि यह इतनी मजबूत होगी कि इस पर भारी सैन्य वाहन, तोपें और रसद सामग्री को बेहद कम समय में सीधे एलएसी के अग्रिम मोर्चों तक पहुंचाया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चीन के खिलाफ भारत की रक्षात्मक स्थिति को आक्रामक ताकत में तब्दील करने वाला साबित होगा।
ताकसिंग की रणनीतिक अहमियत
हुरी से ताकसिंग तक का यह नया मार्ग क्यों इतना जरूरी है, इसे ताकसिंग की भौगोलिक स्थिति से समझा जा सकता है। ताकसिंग अपर सुबनसिरी जिले का एक सुदूर क्षेत्र है, जो जिला मुख्यालय डपोरिजो से 200 किलोमीटर से भी ज्यादा की दूरी पर स्थित है। यह इलाका लंबे समय से भारत और चीन की सीमा के बेहद करीब होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं और बेहतर सड़कों से अछूता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में यहां तक सड़क पहुंच तो गई है, लेकिन मौजूदा रास्ते की स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। ताकसिंग का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह इलाका सीधे तौर पर चीन के तिब्बत क्षेत्र से सटा हुआ है और एलएसी के बेहद करीब है।
मौजूदा सड़कों की चुनौतियां
वर्तमान में नाचो और ताकसिंग के बीच मौजूद सड़क मार्ग बेहद संकरा है और इसकी हालत भी खराब है। स्थानीय निवासियों और सैन्य सूत्रों का कहना है कि सड़क के कई ऐसे हिस्से हैं जहां से दो गाड़ियां एक साथ गुजर भी नहीं सकतीं। इससे न केवल आम नागरिकों को परेशानी होती है, बल्कि आपातकाल की स्थिति में सेना के हथियारों और साजो-सामान की आवाजाही में भी बड़ी बाधा उत्पन्न होती है। यही कारण है कि हुरी से ताकसिंग तक की नई ग्रीनफील्ड सड़क एक विकल्प के रूप में काम करेगी और सेना को एलएसी तक पहुंचने का एक सुरक्षित एवं तेज वैकल्पिक मार्ग मुहैया कराएगी।
सेना की लॉजिस्टिक्स में होगा सुधार
किसी भी सीमावर्ती क्षेत्र में एक मजबूत और भरोसेमंद सड़क का होना यह तय करता है कि युद्ध या तनाव की स्थिति में सेना कितनी तेजी से आगे बढ़ सकती है। नई सड़क बनने से सेना के लिए न केवल जवानों की तैनाती आसान होगी, बल्कि इंजीनियरिंग सामान, ईंधन और मेडिकल सहायता को भी तेजी से फॉरवर्ड बेस तक पहुंचाया जा सकेगा। एक सैन्य अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि सामरिक दृष्टिकोण से एक से अधिक रास्ते होना किसी भी अच्छी सड़क से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यह प्रस्तावित सड़क उसी दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है जो सीमा पर भारत की चौकसी को और अधिक पुख्ता करेगा।
राजनीतिक इच्छाशक्ति और विकास
यह महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट ऐसे समय में आगे बढ़ रहा है जब एलएसी पर पारंपरिक पेट्रोलिंग को लेकर अक्सर तनाव की खबरें सामने आती रही हैं। सरकार का ध्यान इन दुर्गम इलाकों के विकास पर पूरी तरह से केंद्रित है। मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी इसी साल फरवरी में ताकसिंग के अपने दौरे के दौरान नाचो, कोडुखा और लाइमेकिंग जैसे इलाकों में कई नई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया था। यह सड़क उसी श्रृंखला का एक हिस्सा है, जिसका एकमात्र लक्ष्य सीमावर्ती इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ना और सेना के लिए आवाजाही को निर्बाध बनाना है। चीन की हर संदिग्ध गतिविधि का मुकाबला करने के लिए भारत की यह नई इंफ्रास्ट्रक्चर तैयारी ड्रैगन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
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