मिथिलांचल की खास परंपरा: कैसे घर पर शुद्ध तरीके से तैयार होता था पान वाला चूना बिहार एक महीने पहले 67
मिथिलांचल में पान के साथ उपयोग होने वाले पारंपरिक चूने को बनाने की विधि अब लुप्त हो रही है, जिसे पुराने समय में घरों में ही तैयार किया जाता था।

संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है पान

मिथिलांचल के जनजीवन में पान महज एक साधारण खानपान की सामग्री नहीं है, बल्कि यह यहां की समृद्ध संस्कृति और परंपरा का एक अटूट हिस्सा माना जाता है। पुराने समय में लगभग हर घर में पान के साथ सेवन किए जाने वाले चूने को बेहद शुद्ध और पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता था। हालांकि, समय के साथ यह पुरानी परंपरा अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है।

चूना बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया

मधुबनी जिले के नवटोल गांव के निवासी अनुराग मिश्रा ने इस लुप्त होती विधा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पहले किस प्रकार घरों में चूना बनाया जाता था। अनुराग के अनुसार, इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से घोंघे यानी डोका के खोल का इस्तेमाल किया जाता था। मिट्टी के चूल्हे में घोंघे के खोल और लकड़ी की परतों को एक साथ व्यवस्थित किया जाता था। इसके बाद इसे कई घंटों तक धीमी आंच पर जलाया जाता था।

शुद्धता की गारंटी

जब घोंघे के खोल पूरी तरह जलकर सफेद राख में तब्दील हो जाते थे, तब उस राख को साफ किया जाता था। इस राख को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर 24 घंटे तक पानी में भिगोकर रखा जाता था। पूरी तरह से शुद्ध और खाने योग्य चूना तैयार होने में 24 घंटे से अधिक का समय लगता था। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें रसायनों का कोई उपयोग नहीं होता था, जिसके कारण यह पूरी तरह से मिलावट मुक्त होता था।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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