राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
भरतपुर में बदल रहा है खेती का तरीका
भरतपुर क्षेत्र के किसान अब परंपरागत खेती की सीमाओं को पार कर आधुनिक तकनीकों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इनमें सबसे तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है मचान विधि, जो विशेष रूप से बेल वाली सब्जियों की खेती के लिए एक सफल और लाभकारी मॉडल बनकर उभरी है। इस विधि की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कम जमीन में भी किसान अधिक उत्पादन हासिल कर सकते हैं, जिससे उनकी आमदनी में निरंतर वृद्धि हो रही है।
कौन-सी फसलें उगाई जाती हैं मचान पर
मचान विधि के अंतर्गत किसान मुख्य रूप से लौकी, करेला, खीरा, तोरई, परवल और टमाटर जैसी बेल वाली फसलें उगाते हैं। इन फसलों को भूमि पर फैलाने की बजाय ऊपर निर्मित ढांचे पर चढ़ाया जाता है। इस प्रक्रिया में फसल जमीन के सीधे संपर्क से दूर रहती है, जिससे सड़न की समस्या काफी हद तक समाप्त हो जाती है। साफ-सुथरी और आकर्षक दिखने वाली सब्जियों को बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।
धूप और हवा से घटता है रोग-कीटों का खतरा
मचान तकनीक का एक प्रमुख लाभ यह है कि पौधों को खुले वातावरण में भरपूर धूप और हवा मिलती है। इससे फसल पर रोगों और कीटों का प्रकोप कम हो जाता है और रासायनिक दवाओं की जरूरत भी घट जाती है। कम रसायन उपयोग से उत्पादन लागत में कमी आती है और खेती अधिक लाभकारी बनती है। इसके साथ ही यह विधि पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित और टिकाऊ मानी जा रही है।
कैसे तैयार होता है मचान का ढांचा
मचान बनाने के लिए किसान बांस अथवा मजबूत खंभों का इस्तेमाल करते हैं। सामान्यतः 6 से 7 फीट ऊंचा ढांचा खड़ा किया जाता है, जिस पर तार या प्लास्टिक की जाली बांधी जाती है। इसी जाली पर बेलें फैलती हैं और फल ऊपर की ओर विकसित होते हैं। एक बार यह ढांचा तैयार हो जाने के बाद इसे लंबे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है, जिससे यह निवेश के नजरिए से भी फायदेमंद सिद्ध होता है।
आसान हो जाती है तुड़ाई और देखभाल
मचान विधि से खेती करने पर फसल की देखरेख और तुड़ाई की प्रक्रिया काफी सरल हो जाती है। किसान बिना झुके ही सब्जियों को आसानी से तोड़ सकते हैं, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है। फसल स्वच्छ रहने से बाजार में उसकी मांग बढ़ती है और उचित दाम भी मिलते हैं।
किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका
भरतपुर के किसानों के लिए मचान विधि अब एक मजबूत आधार बनती जा रही है। कम भूमि में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और घटी हुई लागत — इन तीन कारणों से यह तकनीक किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। आने वाले समय में यह अपेक्षा की जा रही है कि और अधिक किसान इस विधि को अपनाकर अपनी खेती को आधुनिक और लाभदायक बनाएंगे।
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