एलपीजी की कीमतें घटें या बढ़ें, बेफिक्र रहती हैं इस गांव की महिलाएं, बायोगैस पर पकता है दोनों वक्त का खाना झारखंड एक महीने पहले 34
कोडरमा के लक्ष्मीपुर गांव में स्वच्छ भारत मिशन के तहत 1500 किलोग्राम क्षमता का बायोगैस प्लांट लगाया गया है, जिससे करीब 32 घरों में सुबह और शाम दो-दो घंटे गैस की आपूर्ति होती है और महिलाएं बिना लकड़ी जलाए खाना बनाती हैं।

देशभर में एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतें आम परिवारों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं, लेकिन कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड स्थित लक्ष्मीपुर गांव की दर्जनों महिलाओं को इसकी कोई चिंता नहीं रहती। यहां की महिलाएं बायोगैस प्लांट से मिलने वाली गैस के सहारे दोनों वक्त का भोजन बड़ी आसानी से तैयार कर लेती हैं। यह पहल जहां महिलाओं की आर्थिक मुश्किलें कम कर रही है, वहीं पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक मिसाल भी पेश कर रही है।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) फेज-2 के अंतर्गत पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल, झुमरी तिलैया द्वारा गोवर्धन योजना के तहत इस गांव में 1500 किलोग्राम क्षमता वाला बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया है। इसके संचालन की जिम्मेदारी गांव के महिला समूह को सौंपी गई है, जिससे महिलाओं की भागीदारी के साथ-साथ उनकी आत्मनिर्भरता भी मजबूत हुई है।

लकड़ी के चूल्हे से मिली राहत

महिला समूह की अध्यक्ष मीना देवी ने बताया कि पहले गांव की महिलाएं खाना पकाने के लिए लकड़ी के चूल्हे पर निर्भर रहती थीं और इसके लिए उन्हें जंगलों से लकड़ी लाकर जुटानी पड़ती थी। चूल्हे से उठने वाला धुआं महिलाओं और बच्चों की सेहत पर भी बुरा असर डालता था।

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत कई महिलाओं को गैस कनेक्शन और चूल्हा तो मिल गया था, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वे नियमित रूप से सिलेंडर रिफिल नहीं करा पाती थीं। ऐसे हालात में बायोगैस प्लांट गांव के लिए बड़े सहारे के रूप में सामने आया।

गोबर से तैयार होती है बायोगैस

मीना देवी के अनुसार बायोगैस के उत्पादन में गांव की महिलाओं की सक्रिय भूमिका रहती है। जिन परिवारों के पास पशुधन है, वे रोजाना करीब 30 किलो गोबर प्लांट में पहुंचाते हैं। सबसे पहले गोबर को फीड स्टॉक टैंक में डाला जाता है और उसमें बराबर मात्रा में पानी मिलाया जाता है। इसके बाद मोटर की सहायता से गोबर और पानी का पतला घोल तैयार किया जाता है, जिसे बायोगैस टैंक में भेजा जाता है। वहां गर्मी की मदद से गैस बननी शुरू हो जाती है।

जैसे-जैसे गैस तैयार होती है, टैंक के ऊपर लगा लोहे का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठने लगता है। गैस बनने के बाद बचा हुआ गोबर का घोल प्रवाह टैंक के रास्ते सोख्ता गड्ढे में पहुंच जाता है। कुछ दिनों बाद सूखने पर महिलाएं इसका उपयोग खेतों में जैविक खाद और गोबर के उपले बनाने में करती हैं।

32 घरों तक पहुंच रही गैस

उन्होंने बताया कि गांव के 32 घरों को पाइपलाइन के जरिए बायोगैस कनेक्शन दिया गया है। रोजाना सुबह दो घंटे और शाम दो घंटे गैस की आपूर्ति की जाती है, जिससे परिवार आसानी से भोजन तैयार कर लेते हैं।

गांव की महिलाओं का कहना है कि एलपीजी की तुलना में बायोगैस उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगती है, क्योंकि इसमें गैस रिसाव या आग लगने जैसी आशंका बहुत कम रहती है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें लगभग मुफ्त में खाना बनाने की सुविधा मिल रही है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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