'क्या तुम कलेक्टर हो?'... इस एक ताने ने MBBS डॉक्टर को बना दिया IAS अफसर करियर एक घंटा पहले 3
एमबीबीएस डॉक्टर डॉ. प्रियंका शुक्ला को एक झुग्गी की महिला ने ताना मारा कि 'तुम कोई कलेक्टर हो क्या?', और इसी बात ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। दूसरे प्रयास में उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास कर AIR 73 हासिल की।

कई बार किसी की एक कड़वी बात या नुकीला ताना पूरी जिंदगी का रुख मोड़ देता है। आईएएस अधिकारी डॉ. प्रियंका शुक्ला के अफसर बनने की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ से साल 2006 में एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद प्रियंका डॉक्टर के तौर पर लोगों की सेवा कर रही थीं। उनके परिवार और खासकर उनके पिता की दिली इच्छा थी कि बेटी सिविल सेवा में जाए, लेकिन डॉक्टरी की कड़ी पढ़ाई और मेहनत को पीछे छोड़कर बिल्कुल नए क्षेत्र में उतरना प्रियंका के लिए आसान नहीं था।

डॉक्टरी के पेशे में पूरी तरह रच-बस चुकीं प्रियंका को यूपीएससी की राह पर लाने के लिए किसी बड़े झटके की जरूरत थी, और वह झटका उन्हें मेडिकल ट्रेनिंग के दौरान ही मिला। झुग्गी-झोपड़ी के दौरे पर पहुंचीं डॉ. प्रियंका को एक सामान्य महिला से ऐसा ताना सुनने को मिला, जिसने उनका मन झकझोर कर रख दिया। उसी पल उन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी परीक्षा पास करने की ठान ली।

'तुम कोई कलेक्टर हो क्या?' – इस एक वाक्य ने पलट दी जिंदगी

एमबीबीएस पूरा करने के बाद डॉ. प्रियंका शुक्ला अपनी ट्रेनिंग के सिलसिले में लखनऊ के एक स्लम इलाके में गई हुई थीं। वहां उन्होंने देखा कि एक महिला अपने बच्चों को बेहद गंदा और असुरक्षित पानी पिला रही है। डॉक्टर होने के नाते ममता और चिंता से भरकर प्रियंका ने उस महिला को टोका और ऐसा अस्वच्छ पानी पीने से मना किया।

प्रियंका की बात सुनकर महिला को न जाने क्यों गुस्सा आ गया और उसने बेहद रूखे लहजे में पलटकर कहा – तुम कोई कलेक्टर हो क्या? प्रियंका ने हैरानी से पूछा कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं, तो महिला ने जवाब दिया कि अगर तुम्हें हमारे गंदा पानी पीने की इतनी ही फिक्र है, तो तुम्हें कलेक्टर बनना चाहिए था। यह बात प्रियंका के दिल में तीर की तरह चुभ गई।

उन्हें एहसास हुआ कि डॉक्टर के रूप में वह बीमारियों का इलाज तो कर सकती हैं, लेकिन समाज की बुनियादी व्यवस्था को बदलने और सुधारने की ताकत सिर्फ 'कलेक्टर' के पास होती है। इसी सोच के साथ डॉ. प्रियंका शुक्ला यूपीएससी की तैयारी में जुट गईं।

पिता का सपना और मां की ममता बनी संबल

प्रियंका के पिता हरिद्वार में तैनात थे और उसी विभाग में काम करते थे, जिसके मुखिया वहां के जिला मजिस्ट्रेट (DM) हुआ करते थे। उनके पिता हमेशा से चाहते थे कि उनके घर के बाहर उनकी बेटी के नाम की नेमप्लेट 'कलेक्टर' के रूप में लगी हो। इस लंबे और कठिन सफर में जब भी प्रियंका को असफलता का डर सताता या हिम्मत डगमगाने लगती, तो वह अपनी मां को फोन करतीं। मां के शब्द उनके लिए संजीवनी का काम करते और उन्हें भीतर से दोबारा मजबूत कर देते।

शॉर्टकट से दूरी और पहली असफलता से सीख

तैयारी शुरू करने से पहले प्रियंका ने यूपीएससी के सिलेबस को 4-5 हिस्सों में बांट लिया। उन्होंने कक्षा 9वीं से 12वीं तक की NCERT किताबों को अपनी पढ़ाई का आधार बनाया। प्रियंका आज के अभ्यर्थियों को सलाह देती हैं कि यूपीएससी की तैयारी में शॉर्टकट तलाशने की भूल कभी न करें।

अपने पहले प्रयास में प्रियंका को नाकामी का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने 1 साल का गैप लिया, अपनी कमियों को दूर किया और 2008 में दोबारा परीक्षा दी। इस पूरी प्रक्रिया ने उन्हें सिखाया कि सिविल सेवा के सफर में धैर्य ही सबसे बड़ा हथियार है।

भूगोल ऑप्शनल के साथ हासिल की 73वीं रैंक

यूपीएससी सीएसई के दूसरे प्रयास में डॉ. प्रियंका शुक्ला ने समय रहते अपना सिलेबस पूरा किया और भूगोल को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना। उनकी मेहनत रंग लाई और यूपीएससी 2009 के नतीजों में उन्होंने 73वीं रैंक हासिल की। उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला, जहां वे अपनी बेहतरीन प्रशासनिक क्षमता के लिए जानी जाती हैं।

प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने के साथ-साथ आईएएस प्रियंका शुक्ला एक पेंटर, डांसर, कैलिग्राफर, डूडलर, कुक और कवयित्री भी हैं। यही वजह है कि वे आज के युवाओं के लिए एक ऑलराउंडर रोल मॉडल बन चुकी हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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