साढ़े चार सौ साल पुराना भोजासर: जहां मृत्युभोज को विदा कर शिक्षा बनी जीवन का लक्ष्य, आज पूरे प्रदेश की प्रेरणा राजस्थान एक घंटा पहले 3
झुंझुनूं जिले का 450 वर्ष पुराना भोजासर गांव करीब 74 साल पहले मृत्युभोज पर रोक लगाकर शिक्षा और सामाजिक सुधार की मिसाल बन गया।

झुंझुनूं जिले में बसा 450 वर्ष पुराना भोजासर गांव अपनी सामाजिक जागरूकता, शिक्षा के प्रति समर्पण और प्रगतिशील सोच के कारण समूचे क्षेत्र में अलग पहचान रखता है। यहां के लोगों ने वर्षों पहले जो सामाजिक फैसले लिए, उन्हीं की बदौलत आज यह गांव एक आदर्श के रूप में देखा जाता है।

सात दशक पहले लिया गया साहसिक फैसला

गांव ने करीब 74 वर्ष पूर्व ही मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुप्रथा को समाप्त करने का साहसी निर्णय लिया था। उस दौर में लिया गया यह कदम आज भी गांव की तरक्की और सामाजिक बदलाव की सबसे मजबूत बुनियाद माना जाता है। यह निर्णय बताता है कि भोजासर के लोग समय से बहुत आगे की सोच रखते थे।

बचत को बनाया प्रगति का माध्यम

मृत्युभोज पर होने वाले अनावश्यक व्यय को रोककर ग्रामीणों ने उस धन और ऊर्जा को शिक्षा, विकास और समाज कल्याण से जुड़े कार्यों में लगाया। यही सोच आगे चलकर गांव की उन्नति का रास्ता बनी।

शिक्षा बनी पहचान

इन प्रयासों का असर यह हुआ कि गांव में शिक्षा का स्तर निरंतर ऊंचा होता गया और नई पीढ़ी को आगे बढ़ने के बेहतर अवसर मिले। पढ़ाई को मिशन की तरह अपनाने से युवाओं के लिए नई राहें खुलीं।

आदर्श गांव की मिसाल

सामाजिक एकता, जागरूकता और सुधारवादी दृष्टिकोण ने भोजासर को एक आदर्श गांव के रूप में स्थापित कर दिया है। यही कारण है कि आज यह गांव न केवल अपने क्षेत्र, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गया है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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