राजस्थान राज्यसभा चुनाव: राजेन्द्र राठौड़ के हाथ फिर खाली, भवानीपुर का 'माइक्रो मैनेजमेंट' भी न दिला सका टिकट राजस्थान एक घंटा पहले 3
राजस्थान कोटे की तीन राज्यसभा सीटों के लिए हुए टिकट वितरण में बीजेपी के दिग्गज नेता राजेन्द्र राठौड़ एक बार फिर पिछड़ गए। पश्चिम बंगाल की भवानीपुर सीट पर शुभेंदु अधिकारी की जीत में अहम योगदान के बावजूद उन्हें पार्टी ने मौका नहीं दिया।

राजस्थान के कोटे वाली राज्यसभा की तीन सीटों के लिए हुए टिकट बंटवारे में बीजेपी के अनुभवी नेता राजेन्द्र राठौड़ का नाम एक बार फिर सूची से बाहर रह गया। राठौड़ इस बार दावेदारों की दौड़ में मजबूती से शामिल माने जा रहे थे, मगर आखिरकार उनके हाथ निराशा ही लगी।

हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनाव में वहां की सबसे चर्चित भवानीपुर सीट पर बीजेपी की जीत में राठौड़ की भूमिका को बेहद अहम आंका गया। इसी आधार पर यह उम्मीद बंध गई थी कि उनके इस योगदान का इनाम राज्यसभा की टिकट के रूप में मिल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

विधानसभा हार के बाद से लगातार इंतजार

विधानसभा का चुनाव हारने के बाद पहले यह चर्चा थी कि राठौड़ को जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है, परंतु वैसा नहीं हुआ। भवानीपुर वही सीट है जहां पश्चिम बंगाल की कमान संभालने वाले शुभेंदु अधिकारी और तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच सीधा मुकाबला था। इस टक्कर में शुभेंदु ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी। इसके बाद राठौड़ के योगदान को राज्यसभा की दावेदारी का बड़ा आधार समझा जाने लगा था, मगर टिकट उनके खाते में नहीं आई।

पांच दशक का सियासी सफर

बीते करीब पांच दशक से राजस्थान की राजनीति में सक्रिय राजेन्द्र राठौड़ बीजेपी के कद्दावर नेताओं में गिने जाते हैं। उन्हें प्रदेश के जमीनी नेताओं में शुमार किया जाता है और वे लंबे समय से पार्टी की प्रदेश इकाई की कोर कमेटी का हिस्सा रहे हैं।

राठौड़ सात बार विधायक, एक बार उप सचेतक, दो बार मंत्री, एक बार उपनेता प्रतिपक्ष और एक बार नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। साल 2023 में वे चूरू जिले की तारानगर विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे।

छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू करने वाले राठौड़ के बारे में माना जाता है कि उन्हें चुनाव जिताने में महारत हासिल है। राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष से लेकर लंबी राजनीतिक पारी तक उनकी कुशलता के सभी कायल रहे हैं। यही वजह है कि 2023 की उनकी हार को बेहद अप्रत्याशित माना गया। उस समय राजनीतिक गलियारों में यह कहा जाता था कि तारानगर से विधायक चुने गए नरेन्द्र बुडानिया की जीत से ज्यादा चर्चा राजेन्द्र राठौड़ की हार की थी। उस दौरान राठौड़ नेता प्रतिपक्ष के पद पर थे, इसलिए यह हार उनके लिए बड़ा झटका साबित हुई।

पूनिया को मिली थी हरियाणा की कमान

राठौड़ के साथ ही उस समय सतीश पूनिया भी जयपुर की आमेर सीट से चुनाव हार गए थे। पूनिया उस वक्त उपनेता प्रतिपक्ष के पद पर थे। नेता प्रतिपक्ष और उपनेता प्रतिपक्ष दोनों की हार से सियासी हलकों में हलचल मच गई थी। माना जा रहा था कि इन दोनों दिग्गजों को लोकसभा चुनाव में अवसर मिल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बाद में सतीश पूनिया को हरियाणा का राज्य प्रभारी जैसी अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके पीछे बड़ी वजह जातीय समीकरण रहा। हरियाणा जाट बहुल राज्य है और वहां पहले कई जाट नेता मुख्यमंत्री रह चुके हैं, मगर बीजेपी ने वहां ओबीसी चेहरे को आगे रखा। पहले मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री थे, जिन्हें बाद में ओबीसी चेहरे नायब सिंह सैनी से बदला गया। ऐसे में पार्टी को वहां एक मजबूत और सॉफ्ट जाट नेता की दरकार थी, और पूनिया इस कसौटी पर खरे उतरे। उन्होंने वहां जमकर मेहनत की और हरियाणा में बीजेपी सरकार की वापसी में उनकी भूमिका अहम मानी गई।

हार के बाद नहीं मिली कोई बड़ी जिम्मेदारी

दूसरी ओर, राजेन्द्र राठौड़ को हार के बाद न तो लोकसभा चुनाव में मौका मिला और न ही कोई बड़ी जिम्मेदारी। इसके बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि पार्टी उन्हें राज्यसभा में अवसर दे सकती है। इसी बीच उन्हें पश्चिम बंगाल के चुनाव में भेजा गया।

पश्चिम बंगाल में मारवाड़ी समुदाय, खासकर शेखावाटी के लोगों की बड़ी संख्या है। इसी वोट बैंक को साधने के लिए बीजेपी ने राजस्थान के कई नेताओं को वहां भेजा, जिनमें राठौड़ भी शामिल थे। संयोग की बात है कि राठौड़ और पूनिया दोनों ही शेखावाटी से आते हैं और दोनों एक ही जिले चूरू से ताल्लुक रखते हैं। चूरू राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर स्थित है। राठौड़ चूरू तहसील के हैं, जबकि पूनिया राजगढ़ तहसील के हैं। राजगढ़ भी जाट बहुल इलाका है और पूरी तरह हरियाणा की सीमा से सटा हुआ है, इसी कारण वहां हरियाणवी संस्कृति का खासा असर है। शेखावाटी के कई बड़े कारोबारी और कामगार पश्चिम बंगाल में बसे हैं और उन्हीं को साधने के मकसद से राठौड़ को वहां भेजा गया था। उनके साथ सात-आठ अन्य विधायकों की टीम भी थी।

भवानीपुर की जीत और टूटी उम्मीदें

संयोगवश राठौड़ को पश्चिम बंगाल की सबसे कड़ी टक्कर वाली विधानसभा सीट भवानीपुर भेजा गया, जहां बीजेपी के स्टार चेहरे शुभेंदु अधिकारी का मुकाबला टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी से था। इस जंग में शुभेंदु ने ममता को मात दे दी।

सबसे बड़ी बात यह रही कि नतीजे आते ही शुभेंदु अधिकारी ने मीडिया के सामने राजेन्द्र राठौड़ का नाम लेते हुए कहा कि इस जीत में राठौड़ और उनकी टीम की भूमिका अहम रही।

मारवाड़ी लोगों को मनाने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं।

शुभेंदु अधिकारी का यह बयान राजस्थान में सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ, जिससे राठौड़ और उनके समर्थकों के चेहरे खिल उठे। राजनीतिक गलियारों में पश्चिम बंगाल में राठौड़ के माइक्रो मैनेजमेंट की काफी चर्चा हुई और यह कयास तेज हो गए कि अब उन्हें राज्यसभा में मौका मिलना तय है। राठौड़ और उनके समर्थकों की उम्मीदें भी परवान चढ़ गई थीं। लेकिन गुरुवार को जैसे ही टिकटों की घोषणा हुई, सारे कयास धरे के धरे रह गए।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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