उत्तर प्रदेश
2 घंटे पहले
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धान की खेती करने वाले किसानों के लिए खैरा रोग किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। यह बीमारी न सिर्फ फसल की पैदावार को घटाती है, बल्कि किसानों की मेहनत से कमाई गई आमदनी पर भी सीधा असर डालती है। समय रहते इसकी पहचान और रोकथाम कर ली जाए तो नुकसान से बचा जा सकता है।
क्यों होता है खैरा रोग
फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन खान बताते हैं कि यह रोग मिट्टी में जिंक की कमी होने के कारण पनपता है। जिंक की कमी से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और उनका सामान्य विकास नहीं हो पाता। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, पौधे कमजोर पड़ते जाते हैं और फसल पर इसका सीधा असर दिखाई देने लगता है।
रोग के शुरुआती लक्षण
इस बीमारी की सबसे बड़ी पहचान पत्तियों पर पड़ने वाले धब्बे हैं। संक्रमण होने पर पत्तियों पर तांबे जैसे भूरे रंग के धब्बे उभर आते हैं। इन्हीं लक्षणों से किसान शुरुआती अवस्था में ही रोग की पहचान कर सकते हैं और बचाव के उपाय अपना सकते हैं।
बचाव का वैज्ञानिक तरीका
विशेषज्ञों के अनुसार इस रोग से बचने का सबसे सटीक और वैज्ञानिक उपाय यह है कि किसान धान की रोपाई से पहले ही खेत की तैयारी के दौरान जिंक का इस्तेमाल कर लें। आखिरी जुताई के समय खेत में जिंक सल्फेट मिला देने से मिट्टी में जिंक की कमी पूरी हो जाती है और रोग लगने की आशंका काफी हद तक खत्म हो जाती है।
कितनी मात्रा में डालें जिंक
रोपाई से पहले आखिरी जुताई के समय खेत में जिंक सल्फेट का सही मात्रा में प्रयोग करना जरूरी है, ताकि मिट्टी में जिंक का संतुलन बना रहे और पौधों को इसकी पर्याप्त मात्रा मिल सके। यही समय पर उठाया गया कदम फसल को खैरा रोग से सुरक्षित रखता है और पैदावार में गिरावट को रोकता है।
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