कम जमीन में बंपर मुनाफा, छपरा के किसान बैगन, टमाटर और मिर्च की नर्सरी से कमा रहे हैं 40 हजार रुपये महीना बिहार 2 महीने पहले 75
छपरा के किसान अब पारंपरिक खेती से हटकर नए तरीके अपना रहे हैं। कम जगह में नर्सरी तैयार कर ये किसान हर महीने लाखों की कमाई कर रहे हैं और दूसरों के लिए मिसाल बन गए हैं।

खेती के नए तरीके से संवर रही तकदीर

छपरा के किसान अब कृषि वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण लेकर खेती की नई पद्धतियों को अपना रहे हैं। इनमें से कई किसान ऐसे हैं जो बहुत ही कम जमीन का उपयोग करके साल भर अच्छी कमाई करने में सफल हो रहे हैं। इन किसानों का तरीका बेहद अनूठा है। ये न केवल जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि स्वयं अपने खेतों में पौधों की नर्सरी यानी बीज तैयार कर उसे पूरे साल बेचने का काम भी कर रहे हैं। बीज उत्पादन के इस काम के लिए उन्हें बहुत अधिक जमीन की जरूरत भी नहीं पड़ती है।

छोटे से खेत से मोटी कमाई

छपरा के किसान मात्र पांच कट्ठा से भी कम जमीन का उपयोग करके साल भर बीज उगाकर बेच रहे हैं और महीने के 35 से 40 हजार रुपये तक की कमाई कर लेते हैं। इस अनोखे खेती मॉडल को मांझी, रिविलगंज और दिघवारा प्रखंड के सैकड़ों किसान अपना रहे हैं। मांझी प्रखंड के शीतलपुर गांव निवासी उमेश कुमार प्रसाद, रमेश प्रसाद और बगेंद्र प्रसाद जैसे कई किसान नर्सरी तैयार करने के काम में जुटे हुए हैं। ये किसान केवल तीन से चार धुर जमीन में हजारों की संख्या में पौधे तैयार कर लेते हैं। इतनी कम जमीन से ही एक बार में 35 से 40 हजार रुपये तक का मुनाफा हो जाता है। किसान यहाँ बैगन, टमाटर, हरी मिर्च, गोभी जैसी तमाम सब्जियों की नर्सरी तैयार करते हैं।

तेजी से तैयार होती है फसल

इन किसानों की एक खासियत यह है कि इनके द्वारा तैयार किया गया बिचड़ा केवल 10 से 15 दिन में तैयार हो जाता है। जैसे ही एक खेप तैयार होकर बिकती है, किसान तुरंत अगली खेप के लिए बीज लगा देते हैं। इस तरह के चक्र से वे एक महीने में 50 हजार रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं। उमेश प्रसाद जैसे किसान साल भर यह काम करते हैं। गर्मियों में तो बीज तैयार करना आसान होता है, लेकिन सर्दी के मौसम में यह एक बड़ी चुनौती बन जाती है। हालांकि, कृषि विज्ञान केंद्र मांझी से मिले प्रशिक्षण की बदौलत अब वे खुद से ही जुगाड़ू पॉलीथीन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे मुश्किल मौसम में भी पौधे सुरक्षित रहते हैं। इस तकनीक से महज 7 से 8 दिन में बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले लेते हैं और 10 से 12 दिन के भीतर ये रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।

दूर-दूर से आते हैं किसान

बरसात, गर्मी और सर्दी हर मौसम में तैयार पौधों की उपलब्धता के कारण छपरा जिले के कोने-कोने से किसान यहां हाइब्रिड नर्सरी खरीदने के लिए पहुंचते हैं। यह तरीका उन लोगों के लिए बेहतरीन उदाहरण है जो कम जगह में बेहतर आय का स्रोत तलाश रहे हैं। इसके लिए बहुत बड़े रकबे यानी बीघा या एकड़ जमीन की आवश्यकता नहीं है, बल्कि महज 5 कट्ठा जमीन ही पर्याप्त है। स्थानीय किसान रमेश प्रसाद बताते हैं कि वे लगातार पौधों को तैयार कर रहे हैं। उनके पास बैगन, टमाटर, गोभी, हरी मिर्च, लौकी, नेनुआ और खीरा समेत तमाम सब्जियों के पौधे हमेशा उपलब्ध रहते हैं।

उन्नत किस्मों का चयन

रमेश प्रसाद ने बताया कि वे उन्नत किस्मों के पौधे तैयार करते हैं ताकि किसानों को खेती में अधिक पैदावार मिले। उनके पास हाइब्रिड और देसी दोनों तरह के पौधे उपलब्ध रहते हैं। उन्होंने बताया कि 'नौव किरण' और '704' सबसे मशहूर वैरायटी हैं। इसके अलावा देसी किस्मों में हरा और सफेद बैगन भी लोगों द्वारा काफी पसंद किया जाता है। दूर-दराज से आने वाले किसान उनके द्वारा तैयार किए गए स्वस्थ पौधों को ले जाकर अपनी खेती को सफल बना रहे हैं। इस तकनीक ने खेती को महज जीवनयापन का जरिया न रखकर मुनाफे का एक बड़ा स्रोत बना दिया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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