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एक घंटा पहले
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डायबिटीज का मस्तिष्क पर गंभीर असर
भारत में डायबिटीज एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभर रही है। देश में लगातार बढ़ रहे मरीजों की संख्या के साथ ही यह बीमारी केवल ब्लड शुगर तक ही सीमित नहीं रह गई है। लंबे समय तक डायबिटीज से जूझने पर आंखों की रोशनी धुंधली होना, किडनी का कार्य प्रभावित होना, लगातार थकान महसूस करना और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस पर निरंतर शोध किया जा रहा है ताकि इस घातक बीमारी के प्रभावों को समझा जा सके। इसी क्रम में हैदराबाद यूनिवर्सिटी द्वारा की गई एक ताजा रिसर्च ने चिकित्सा जगत में नई उम्मीद जगाई है। इस शोध में सामने आया है कि डायबिटीज का सीधा असर हमारी याददाश्त यानी मेमोरी पर पड़ता है।
मेमोरी लॉस को पलटने की संभावना
इस रिसर्च की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि याददाश्त का कम होना स्थायी नहीं हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते उन विशेष मॉलिक्यूल्स के असंतुलन को पहचान लिया जाए, जो डायबिटीज के कारण घटते-बढ़ते हैं, तो ट्रीटमेंट के जरिए याददाश्त को पुरानी स्थिति में वापस लाया जा सकता है। जहां से मेमोरी लॉस की प्रक्रिया शुरू हुई थी, वहीं तक मस्तिष्क की क्षमता को दोबारा बहाल करने की संभावना इस शोध ने जताई है।
दो साल की गहन रिसर्च
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर आकाश गौतम ने इस दिशा में जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि उनकी टीम पिछले 2 साल से इस विषय पर लगातार रिसर्च कर रही है। मध्य प्रदेश की डॉक्टर हरि सिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पहुंचे असिस्टेंट प्रोफेसर आकाश गौतम के अनुसार, यह शोध अभी भी जारी है और इसके हर पहलू की बारीकी से जांच की जा रही है। रिसर्च के इस दौर में वैज्ञानिकों ने चूहों पर प्रयोग किया, जिन्हें इंजेक्शन के माध्यम से डायबिटीज से ग्रस्त किया गया था। अध्ययन में स्पष्ट रूप से देखा गया कि डायबिटीज से प्रभावित चूहों की सीखने और याद रखने की क्षमता यानी लर्निंग मेमोरी काफी कम हो गई थी।
क्या है डायबिटीज और कैसे प्रभावित होता है मस्तिष्क
डायबिटीज की स्थिति में शरीर की इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता खत्म होने लगती है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि शरीर के भीतर ग्लूकोज का ब्रेकडाउन यानी उसका टूटना कम हो जाता है। जब ग्लूकोज पूरी तरह नहीं टूटता है, तो वह शरीर में जमा होने लगता है। इसके कारण शरीर के सामान्य कार्य प्रभावित होने लगते हैं। शरीर के अंगों पर पड़ने वाले इसी दुष्प्रभाव को समझते हुए वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क पर होने वाले असर का अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि डायबिटीज की वजह से मस्तिष्क की संज्ञानात्मक क्षमता यानी कॉग्निटिव कैपेसिटी घट जाती है। यही कारण है कि मरीजों में डिमेंशिया और याददाश्त कमजोर होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
मॉलिक्यूल्स का संतुलन ही है समाधान
इस रिसर्च का मुख्य केंद्र मस्तिष्क के दो प्रमुख मॉलिक्यूल्स हैं, जिन्हें 81 और 82 यानी एंजियोटेंसिन वन और एंजियोटेंसिन टू कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने अपनी जांच में पाया कि डायबिटीज के प्रभाव से इनमें से एक मॉलिक्यूल घट जाता है और दूसरा बढ़ जाता है। इस असंतुलन को यदि किसी सटीक ट्रीटमेंट या दवा के माध्यम से सही कर दिया जाए, तो मस्तिष्क की याददाश्त को दोबारा अपने मूल स्तर पर लाया जा सकता है। यह शोध आने वाले समय में डायबिटीज के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद की किरण साबित हो सकती है, जो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में कारगर होगी।
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