झारखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
यूट्यूब बना प्रेरणा का जरिया
बोकारो जिले के चास प्रखंड स्थित काशीझरिया गांव के किसान मनोज गोस्वामी आज अपने इलाके में एक मिसाल बन चुके हैं। उन्होंने 'मचान विधि' से नेनुआ की खेती कर यह साबित कर दिया कि सूझबूझ और सही तकनीक के दम पर कम पूंजी में भी शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है। मनोज गोस्वामी ने बताया कि वह पिछले 15 सालों से खेती करते आ रहे हैं। गांव के अनुभवी किसानों और यूट्यूब पर उपलब्ध जानकारियों से प्रेरित होकर उन्होंने आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाने का फैसला किया।
शुरुआत में उन्हें यह डर सता रहा था कि मचान बनाने में लगाई गई पूंजी कहीं बेकार न हो जाए, लेकिन पहली बार में ही उम्मीद से बेहतर उत्पादन देखकर उनका हौसला बढ़ गया। तब से वह लगातार इसी विधि से खेती कर रहे हैं और हर बार अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं।
45 से 50 दिन में तैयार हो जाती है फसल
मनोज ने बताया कि उन्होंने मई महीने में नेनुआ की बुवाई की थी। इस फसल की खासियत यह है कि यह मात्र 45 से 50 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। उन्होंने करीब 60 डिसमिल यानी लगभग एक बीघा जमीन पर खेती की। इस पूरी प्रक्रिया में उनकी कुल लागत लगभग 5,000 रुपये ही रही, क्योंकि मचान बनाने के लिए आवश्यक बांस उनके पास पहले से मौजूद थे।
50 क्विंटल तक उत्पादन, लाखों की आमदनी
अपने अनुभव के आधार पर मनोज बताते हैं कि 60 डिसमिल जमीन से करीब 50 क्विंटल या उससे भी ज्यादा नेनुआ का उत्पादन किया जा सकता है। इस समय बाजार में नेनुआ 30 से 35 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है। इस हिसाब से एक किसान इस खेती से 1.5 से 1.75 लाख रुपये तक की आमदनी अर्जित कर सकता है। मनोज अपनी तैयार उपज को पिंडराजोड़ा हाट में ले जाकर बेचते हैं, जहां उन्हें उचित दाम मिल जाता है।
बरसात में रहें सतर्क, कीट और रोग से बचाव जरूरी
किसान मनोज गोस्वामी ने साथी किसानों को सलाह देते हुए कहा कि बरसात के मौसम में नेनुआ की फसल पर कीट और बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। खासकर पत्तियों में वायरस संक्रमण और झुलसा रोग जैसी समस्याएं देखी जाती हैं। इनसे बचाव के लिए समय पर जैविक कीटनाशकों का उपयोग और उचित फसल प्रबंधन अपनाना बेहद जरूरी है।
मनोज का मानना है कि सही तकनीक, नियमित देखभाल और थोड़ी सतर्कता के साथ मचान विधि से नेनुआ की खेती कम लागत में अधिक मुनाफे का एक बेहतरीन जरिया बन सकती है। उनकी कामयाबी देख गांव के कई किसान अब उनसे यह तकनीक सीखने आ रहे हैं।
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