बिहार के सरकारी स्कूल में 'पेड़ कांड', शिक्षक ने चुपके से बेच डाला वर्षों पुराना बरगद, जांच में जुटी पुलिस बिहार एक घंटा पहले 2
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में एक सरकारी स्कूल के शिक्षक द्वारा परिसर में लगे विशालकाय बरगद के पेड़ को बेचने का गंभीर मामला सामने आया है। पुलिस और शिक्षा विभाग ने मौके पर पहुंचकर कटाई को रुकवा दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है।

बिहार के पूर्वी चंपारण से सरकारी संपत्ति की बंदरबांट और प्रशासनिक मनमानी का एक बेहद हैरान करने वाला मामला प्रकाश में आया है। यहां के फेनहारा क्षेत्र में स्थित एक सरकारी विद्यालय में वर्षों पुराना और हरा-भरा बरगद का पेड़ खड़ा था, जिसे कथित तौर पर उसी स्कूल के एक शिक्षक ने चुपके से बेच डाला। यह घटना केवल पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की कमी को ही नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे सरकारी संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति समझकर उसका सौदा कर दिया गया। जैसे ही इस 'पेड़ कांड' की भनक स्थानीय लोगों और प्रशासन को लगी, पूरे शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर रुकवाई कटाई

स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, स्कूल परिसर में सालों से लहरा रहा यह विशालकाय बरगद का पेड़ पर्यावरण के साथ-साथ स्कूल के बच्चों को छाया देने का काम करता था। लेकिन विद्यालय के ही एक शिक्षक की मनमानी के चलते इस हरे-भरे पेड़ की बेरहमी से कटाई शुरू करवा दी गई। जब पेड़ के एक बड़े हिस्से को काटकर गिरा दिया गया, तब इसकी भनक गांव के लोगों को लगी। इसके बाद किसी जागरूक नागरिक ने इसकी सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को दी। खबर मिलते ही डायल 112 की पुलिस टीम और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी दल-बल के साथ मौके पर पहुंच गए। अधिकारियों ने आनन-फानन में पेड़ की कटाई को रुकवाया और वहां चल रहे काम को पूरी तरह बंद करा दिया।

जब पुलिस टीम और प्रशासनिक अधिकारी घटना स्थल पर पहुंचे, तो वहां कुल्हाड़ी, आरी और पेड़ काटने के अन्य उपकरण बिखरे पड़े मिले। पेड़ के निचले हिस्से पर काटने के गहरे और ताजे निशान थे, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यदि पुलिस और शिक्षा विभाग के अधिकारी थोड़ी भी देरी करते, तो वर्षों पुराना यह धरोहर नुमा पेड़ पूरी तरह जमींदोज हो चुका होता। अधिकारियों ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछताछ की और साक्ष्य जुटाए।

मामले को दबाने की कोशिश पर उठे सवाल

इस पूरे मामले में स्कूल प्रशासन की भूमिका भी गहरे संदेह के घेरे में आ गई है। विद्यालय की प्रभारी प्रधानाध्यापिका पर भी अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि जब पेड़ काटने का मामला उजागर हुआ, तो उन्होंने थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए एक लिखित आवेदन तैयार तो किया था, लेकिन उसे कभी पुलिस थाने में जमा नहीं कराया गया। इस वजह से स्थानीय लोगों में यह चर्चा आम है कि मामले को दबाने और आरोपी शिक्षक को बचाने के लिए रसूखदारों के दबाव में यह कदम उठाया गया। अब ग्रामीण और स्थानीय लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर वह कौन सा दबाव था, जिसके कारण इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी आधिकारिक शिकायत दर्ज कराने से हाथ खींच लिए गए।

जांच में हुआ बड़ा खुलासा, रसोइया काट रही थी पेड़

मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी कपिलदेव राम ने घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि विद्यालय की ही एक रसोइया आरोपी शिक्षक के आदेश पर उस विशालकाय पेड़ को काट रही थी। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी ने बताया कि रसोइया ने खुद स्वीकार किया है कि वह शिक्षक सुधाकर सिंह के आदेश पर इस काम को अंजाम दे रही थी। इस खुलासे के बाद अब आरोपी शिक्षक सुधाकर सिंह की मुश्किलें काफी बढ़ती नजर आ रही हैं और विभाग इस मामले को लेकर सख्त रुख अपना रहा है।

दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की तैयारी

सरकारी स्कूल की इस बहुमूल्य संपत्ति को इस तरह चोरी-छिपे बेचने और उसे काटने के इस कृत्य ने पूरे इलाके के लोगों को हैरान कर दिया है। पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने आरोपी शिक्षक और इसमें शामिल अन्य सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने साफ किया है कि सरकारी परिसरों में मौजूद पेड़ों या किसी भी अन्य संपत्ति को बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के काटना या बेचना एक गंभीर अपराध है।

इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेजी जा रही है ताकि आरोपी शिक्षक के खिलाफ तत्काल निलंबन और विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जा सके। फिलहाल पुलिस और शिक्षा विभाग इस बात की तहकीकात कर रहे हैं कि इस हरे-भरे बरगद के पेड़ को किसे बेचा गया था और इसमें कितने रुपये का लेन-देन हुआ था।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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