छत्तीसगढ़
9 घंटे पहले
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विचारों
सरकारी अस्पतालों में नियमों की आड़ में बरती जाने वाली संवेदनहीनता किस तरह किसी की जान पर भारी पड़ सकती है, इसकी एक झकझोर देने वाली मिसाल भिलाई के जिला अस्पताल में सामने आई है। यहां एक लाचार पिता अपनी जवान बेटी के लिए खून मांगते हुए डॉक्टरों और ब्लड बैंक कर्मचारियों के सामने गिड़गिड़ाता रहा, हाथ जोड़ता रहा। अस्पताल के पास खून का पर्याप्त स्टॉक भी था, फिर भी 'डोनर लाओ, खून पाओ' के कागजी नियम पर अड़े स्टाफ का दिल नहीं पसीजा। नतीजा यह रहा कि 36 घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच जूझती बेटी आखिरकार अस्पताल के बिस्तर पर ही चल बसी।
क्या है पूरा मामला
यह दर्दनाक घटना 30 मई की रात की है। मरोदा निवासी मन्नूराम अपनी 22 वर्षीय बेटी दीपिका को गंभीर हालत में जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। दीपिका सिकलिन की बीमारी से जूझ रही थी और उसकी जान बचाने के लिए तत्काल एक यूनिट 'ओ पॉजिटिव' रक्त की आवश्यकता थी।
उस वक्त जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में 'ओ पॉजिटिव' ग्रुप का कुल 85 यूनिट रक्त सुरक्षित रखा हुआ था। इसके बावजूद ब्लड बैंक कर्मियों ने मानवता को किनारे रखकर पिता के सामने तुरंत एक्सचेंज डोनर लाने की अनिवार्य शर्त थोप दी। बेटी की बिगड़ती हालत देखकर पिता अगले 36 घंटे डोनर की तलाश में दर-दर भटकते रहे, मगर समय रहते कोई डोनर नहीं मिल सका। आखिरकार समय पर खून न मिल पाने के कारण दीपिका की मौत हो गई।
खून चढ़ाने को लेकर क्या कहता है नियम
स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सिकलिन, थैलेसीमिया और हीमोफिलिया जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को आपातकालीन स्थिति में बिना किसी 'एक्सचेंज डोनर' और बिना किसी प्रोसेसिंग शुल्क के तत्काल खून उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके बावजूद ब्लड बैंक कर्मियों ने नियमों का गलत हवाला देकर दीपिका को खून देने से साफ इनकार कर दिया और मंत्रालय के कड़े निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं।
इलाज में भी बरती गई लापरवाही
अस्पताल की लापरवाही सिर्फ ब्लड बैंक तक सीमित नहीं रही, बल्कि डॉक्टरों के इलाज के तरीके पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पहली चूक यही हुई कि दीपिका को आपातकालीन प्रोटोकॉल के तहत कैजुअल्टी वॉर्ड में भर्ती कर स्थिर करने के बजाय सीधे फीमेल वॉर्ड भेज दिया गया। वहां मौजूद डॉक्टर ने खून की कमी बताकर जांच तो लिख दी, लेकिन उसके बाद मरीज को दोबारा देखने नहीं आया।
दूसरी बड़ी लापरवाही यह रही कि हाई कोर्ट में पेश हलफनामे के मुताबिक ऑन-कॉल विशेषज्ञों को बुलाने का कोई रोस्टर नहीं अपनाया गया और पूरी रात किसी विशेषज्ञ डॉक्टर ने दीपिका की सुध नहीं ली। हैरानी की बात यह रही कि अस्पताल के डॉक्टरों को रविवार सुबह ही पता चल गया था कि दीपिका सिकलिन की मरीज है, इसके बावजूद उसे अगले 16 घंटे तक आईसीयू में शिफ्ट नहीं किया गया।
सोमवार को जब मरीज की हालत बेहद नाजुक और जानलेवा स्तर पर पहुंच गई, तब आनन-फानन में उसे आईसीयू भेजा गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कुछ ही देर में दीपिका ने दम तोड़ दिया।
अस्पताल प्रशासन का पक्ष और परिजनों का आरोप
सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए दावा किया है कि डॉक्टरों ने अपनी ड्यूटी के दौरान मरीज को आठ बार देखा था। दूसरी ओर परिजनों का सीधा आरोप है कि इलाज में घोर लापरवाही और संवेदनहीनता बरती गई, जिसके कारण उनकी बेटी की जान चली गई।
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