मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
खेती-किसानी में जब भी कोई नया प्रयोग होता है, वह अक्सर अच्छे मुनाफे का रास्ता खोल देता है। अगर आप परंपरागत खेती से कुछ अलग करना चाहते हैं, जिससे लागत आधी रह जाए और कमाई दोगुनी हो जाए, तो विशेषज्ञों की एक सलाह आपके बहुत काम आ सकती है। इन दिनों विंध्य क्षेत्र के किसानों के बीच एक ऐसा ही तरीका तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसमें वे हल्दी के साथ अरहर की इंटरक्रॉपिंग कर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं।
किसान अंशुमान सिंह के अनुसार, जून के अंत तक इस तकनीक को अपनाकर सीमित जमीन वाले किसान भी बेहतरीन कमाई कर सकते हैं। यह मॉडल न केवल जेब भरता है, बल्कि खेत की मिट्टी को पहले से कहीं अधिक उपजाऊ और मजबूत भी बनाता है।
प्राकृतिक वरदान की तरह काम करता है यह मेल
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि हल्दी और अरहर का यह संयोग सिर्फ मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक वरदान की तरह असर दिखाता है। अरहर के ऊंचे पौधे शुरुआती दिनों में हल्दी की कोमल पत्तियों को विंध्य की तेज और चुभती धूप से बचाते हैं, जिससे हल्दी को बढ़ने के लिए उपयुक्त पार्शियल शेड मिल जाता है।
दूसरी ओर, अरहर की गहरी जड़ें और उनकी ग्रंथियों में मौजूद बैक्टीरिया मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करते हैं। इसका सीधा फायदा यह होता है कि हल्दी को बाहरी और महंगे रासायनिक खाद की जरूरत बहुत कम पड़ती है और उसे जमीन से ही भरपूर पोषण मिलता रहता है।
क्यारियों का प्रबंधन और बीज का उपचार
इस स्मार्ट खेती में उठी हुई क्यारियों का उपयोग किया जाता है, ताकि बारिश के दिनों में खेत में पानी न जमे और फसल की जड़ें सुरक्षित रहें। बुवाई के समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि हल्दी की हर तीन या पांच कतारों के बाद अरहर की एक कतार लगाई जाए, यानी 3:1 या 5:1 का अनुपात रखा जाए।
इसके साथ ही विंध्य क्षेत्र की लाल-पीली या दोमट मिट्टी में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होना बेहद आवश्यक है। एक बात गांठ बांध लें कि बुवाई से पहले बीजों का ट्राइकोडरमा या किसी अच्छे कवकनाशी से उपचार जरूर करें, क्योंकि यही इस खेती की सफलता की असली कुंजी है।
कितना मिलेगा शुद्ध मुनाफा?
यह पूरी फसल लगभग 7 से 9 महीने की होती है। अगर जून के अंत तक बुवाई कर दी जाए, तो अरहर दिसंबर से फरवरी के बीच कटकर तैयार हो जाएगी और हल्दी मार्च से अप्रैल के महीने में खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार रहेगी।
जानकारों का सुझाव है कि शुरुआत हमेशा एक से दो एकड़ की छोटी जमीन से करनी चाहिए, ताकि लेबर और प्रबंधन का खर्च नियंत्रण में रहे। हालांकि, जिनके पास सिंचाई के अच्छे साधन हैं, उनके लिए तीन से पांच एकड़ में बड़े पैमाने पर खेती करना सबसे बेहतर रहता है।
बड़े पैमाने पर थोक उत्पादन होने से ट्रांसपोर्ट का खर्च बच जाता है और बड़े व्यापारी सीधे खेत पर आकर माल उठा लेते हैं। इससे किसानों को प्रति एकड़ ₹1.20 लाख से ₹1.50 लाख तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से मिल जाता है।
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