उत्तराखंड
एक घंटा पहले
2
विचारों
हिमालय की पावन धरती सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनोखे, रसीले और औषधीय गुणों से लबरेज पहाड़ी फलों के लिए भी पहचानी जाती है। यहां के फलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इनमें से कई पूरी तरह प्राकृतिक और जंगली होते हैं। इन्हें उगाने के लिए किसी रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती, मानो इनकी देखभाल खुद कुदरत करती हो।
काफल — पहाड़ का 'शाही फल'
जंगली पहाड़ी फलों की सूची में सबसे पहला नाम काफल का आता है। इसे उत्तराखंड का 'शाही फल' या सबसे चहेता लोक-फल कहा जा सकता है। यह इतना मशहूर है कि इस पर बना प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगीत "काफल पाको मिल न चाखो" भी खूब लोकप्रिय है। यह छोटे, गोलाकार और दानेदार गुच्छों में लगता है। कच्चा होने पर इसका रंग हरा रहता है, लेकिन अप्रैल से जून के बीच पकने पर यह गहरा लाल या जामुनी हो जाता है। इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है।
बताया जाता है कि काफल की शेल्फ लाइफ बेहद कम होती है। पेड़ से तोड़ने के कुछ ही घंटों के भीतर इसे खा लेना पड़ता है, वरना यह कसैला होने लगता है। यही वजह है कि इसे ताजा पिस्यूं लूण यानी पहाड़ी नमक के साथ खाया जाता है। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह फल पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हुए भूख बढ़ाता है। इसके पेड़ की छाल का उपयोग पारंपरिक दवाओं में सर्दी, खांसी और गले की समस्याओं के लिए किया जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि काफल को गुठली समेत भी खाया जा सकता है, जिससे कोई नुकसान नहीं होता। पहाड़ के लिए काफल महज एक फल नहीं, बल्कि वहां के लोगों की संस्कृति की आत्मा माना जाता है, जो गर्मी शुरू होने के सिर्फ 3 महीनों तक ही मिलता है।
हिसालू — हिमालयन गोल्डन रास्पबेरी
दूसरे नंबर पर आता है हिसालू, जिसे हिमालयन गोल्डन रास्पबेरी भी कहते हैं। यह कंटीली झाड़ियों में उगता है। इसे गोल्डन बेरी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह चमकीले पीले या सुनहरे-नारंगी रंग के छोटे-छोटे दानों जैसा दिखता है। यह फल बेहद रसीला और बहुत मीठा होता है, जिसमें हल्की-सी खटास घुली रहती है।
काफल की तरह हिसालू को भी बाजार में लंबे समय तक टिकाए रखना मुश्किल होता है, इसलिए लोग इसे सीधे जंगलों या रास्तों के किनारे की झाड़ियों से तोड़कर ताजा ही खा लेते हैं। खट्टा होने के कारण इसमें विटामिन सी और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं। यह पेट की गर्मी शांत करने और कब्ज व एसिडिटी जैसी परेशानियों को दूर करने में मददगार साबित होता है।
किलमोड़ा — दारुहल्दी का औषधीय खजाना
तीसरे नंबर पर है किलमोड़ा। जामुन जैसा दिखने वाला यह फल भी उत्तराखंड की पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली एक कंटीली झाड़ी का फल है, जिसे 'दारुहल्दी' भी कहा जाता है। इसका स्वाद हल्का खट्टा और कसैला-मीठा होता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से भी यह बेहद उपयोगी है। किलमोड़ा अपनी जड़ों और फलों के औषधीय गुणों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसमें 'बर्बेरिन' नामक तत्व पाया जाता है, जो एंटी-डायबिटिक और एंटी-बैक्टीरियल होता है।
आंखों के रोगों, त्वचा के घावों को भरने और बीपी संतुलित रखने में इसकी जड़ों का रस रामबाण माना जाता है। किलमोड़ा की लकड़ी यानी दारुहल्दी के पाउडर को दूध और पानी के साथ लिया जाता है। पेट से जुड़ी किसी भी तरह की बीमारी को ठीक करने में भी यह बहुत कारगर है। आंखों के लिए भी इसे बहुत फायदेमंद माना गया है। चर्म रोग और डायबिटीज के मरीजों के लिए भी यह औषधि लाभकारी है।
तिमला — पहाड़ों का पारंपरिक अंजीर
चौथे नंबर पर है तिमला। यह पहाड़ों का पारंपरिक अंजीर है, जो मध्य-हिमालयी क्षेत्रों में बहुतायत में मिलता है। यह पेड़ के तनों और मोटी टहनियों पर गुच्छों के रूप में उगता है। पकने पर इसका बाहरी हिस्सा भूरा-बैंगनी और अंदरूनी हिस्सा गहरा लाल हो जाता है। इसका स्वाद बहुत मीठा होता है। पके हुए तिमला को सीधे फल की तरह खाया जाता है, जबकि इसके कच्चे फलों से पहाड़ी सब्जी और चटनी बनाई जाती है। पहाड़ों में इसके पत्तों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से पत्तल बनाने के लिए होता है।
बेडू — साल भर मिलने वाला जंगली अंजीर
पांचवें नंबर पर है बेडू। यह उत्तराखंड का एक और जंगली अंजीर है, जो काफल की तरह ही मशहूर है और इस पर भी लोकगीत "बेडू पाको बारो मासा" बना है। जैसा कि इस लोकगीत में बताया गया है, बेडू पहाड़ों में लगभग साल भर देखने को मिल जाता है। पकने पर यह काला-बैंगनी रंग का हो जाता है और बेहद मीठा होता है। फेफड़ों और मूत्राशय से जुड़ी समस्याओं में इसे पारंपरिक रूप से बहुत फायदेमंद माना जाता है।
Comments
0 comment