दरभंगा के नवीन ने आंगन में उगाई शुद्ध परवल, 6 महीने से नहीं गए बाजार, पूरा परिवार खा रहा ताजी सब्जी बिहार एक महीने पहले 22
दरभंगा के नवीन कुमार पांडे ने घर के दरवाजे की खाली जमीन पर परवल की बेल लगाई और बीते 6 महीने से उनका 10 लोगों का परिवार बिना बाजार गए ताजी, केमिकल-मुक्त परवल खा रहा है।

कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। यही बात दरभंगा के नवीन कुमार पांडे के घर में सच साबित हो रही है। बीते 6 महीने से इस परिवार ने बाजार से एक बार भी परवल नहीं खरीदा, फिर भी रोजाना उनकी थाली में परवल की सब्जी, भुजिया, चटनी और भरवा परवल मौजूद रहता है। इसकी असली वजह है उनके घर के दरवाजे पर लगी हरी-भरी परवल की बेल।

कैसे शुरू हुई घर में खेती

नवीन कुमार पांडे बताते हैं कि मनोरथा गांव की ओर बड़े पैमाने पर परवल की खेती होती है। एक बार वे अपने दोस्त के यहां गए और वहां परवल की लताएं देखकर उनका मन ललचा गया। दोस्त ने उन्हें भी कुछ बेलें दे दीं। नवीन ने सोचा कि जब मनोरथा में यह संभव है, तो उनके दरवाजे की खाली जमीन पर क्यों नहीं।

बिना रासायनिक खाद के तैयार हुई बेल

उन्होंने किसी भी तरह की रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं किया। सिर्फ गोबर की खाद और घर के पानी के सहारे उन लताओं को जमीन में गाड़ दिया। नतीजा सबको चौंकाने वाला रहा। बेल इतनी फलने-फूलने लगी कि 10 लोगों का पूरा परिवार बीते 6 महीने से ताजी परवल तोड़कर खा रहा है। सुबह उठते ही दरवाजे से हरी परवल तोड़ी जाती है, धोकर सीधे रसोई में भेज दी जाती है और बाजार जाने की जरूरत ही खत्म हो गई।

शुद्धता ही सबसे बड़ी खूबी

नवीन पांडे कहते हैं, “यह पूरी तरह बिना खाद की परवल है। बाजार की परवल में दवा और केमिकल का डर बना रहता है, जो सेहत पर बुरा असर डालता है। लेकिन घर की परवल एकदम शुद्ध है, इसलिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसे खाते हैं।”

सेहत के लिए फायदेमंद

परवल वैसे भी आयरन, विटामिन और फाइबर से भरपूर होती है। यह शुगर के मरीजों के लिए लाभकारी मानी जाती है और गर्मियों में शरीर को ठंडक पहुंचाती है। अब नवीन का परिवार रोज परवल की भुजिया, भरवा, चटनी और सब्जी बनाकर खाता है। इससे स्वाद भी बढ़ गया और खर्च की बचत भी हुई।

आत्मनिर्भरता की पहचान

नवीन का कहना है कि थोड़ी-सी जगह और थोड़ी मेहनत से कोई भी अपने घर में सब्जी उगा सकता है। परवल की बेल एक बार लग जाए तो महीनों तक फल देती है। दरभंगा के इस परिवार ने साबित कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर इंसान सिर्फ जुगाड़ ही नहीं, बल्कि सेहत और बचत दोनों का रास्ता निकाल लेता है। आंगन में लगी यह परवल की बेल अब महज सब्जी नहीं, बल्कि उनके आत्मनिर्भर होने की पहचान बन चुकी है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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